Pages

Tuesday, 26 July 2011

अमजद खान : बॉलीवुड के गब्बर सिंह

    यूँतो बॉलीवुड में समय-समय कई अभिनेताओ ने डाकुओ के पात्र में अभिनय किया है और वाहवाही बटोरी है.लेकिन सन 1975 में प्रदर्शित फिल्म "शोले"के पात्र डाकू गब्बर सिंह पूरे देश में तब से लेकर आज तक लोकप्रिय है.और बोलने,चलने-फिरने,हँसने और खैनी फांकने की अदा आज 38 साल बाद भी हम सभी के दिलो दिमाग में बसी है.और समय-समय पर कई अभिनेताओ ने लोकप्रियता पाने के लिए इस पात्र की अदा की नक़ल भी की. डाकू गब्बर सिंह पात्र को परदे पर जीवंत बनाने वाले चमत्कारिक अभिनेता थे-अमजद खान.अमजद खान भले ही आज इस दुनियां में नहीं है,लेकिन डाकू गब्बर सिंह आज भी फ़िल्मी परदे पर जिन्दा है. 
इस  चमत्कारिक अभिनेता का जन्म 12 नवम्बर 1940 को फिल्मों के जाने माने अभिनेता जिक्रिया खान के पठानी परिवार में आन्ध्रप्रदेश के हैदराबाद शहर में हुआ था.इनके पिता बॉलीवुड में जयंत के नाम से काम करते थे.बचपन से ही अमजद खान को अभिनय से लगाव हो गया और थियटर से जुड़ गए.अमजद खान की पहली फिल्म बतौर बाल कलाकार "अब दिल्ली दूर नहीं"{1957},थी,जब वह केवल 17 साल के थे.
अमजद खान पढाई पूरी करने के बाद निर्देशक के.आसिफ के साथ असिस्टेंट के रूप में काम करने लगे.बतौर कलाकार अमजद खान की पहली फिल्म "मुहब्बत और खुदा"थी,जिसमें वह अभिनेता संजीव कुमार के गुलाम की भूमिका की थी.इस बारे में बहुत कम लोग जानते है कि बतौर अभिनेता उनकी पहली फिल्म "शोले"नहीं थी.
गांधी के इस देश में गब्बर सिंह की लोकप्रियता अबूझ पहेली है.फिल्म "शोले"एक बहुत बड़ी फिल्म थी.जब निर्देशक रमेश सिप्पी ने अमजद खान जैसे नये अभिनेता को फिल्म के लिए चुना तो उनके साथियों ने कहा अमजद खान जैसा नया लड़का अमिताभ,धर्मेन्द्र और संजीव कुमार जैसे धुरंधर अभिनेताओ के सामने टिक नहीं पायेगा.हांलाकि पहले इस भूमिका के लिए निर्देशक रमेश सिप्पी डैनी डेन्जोप्पा को लेना चाहते थे.लेकिन वह फिरोज खान की फिल्म "धर्मात्मा"में व्यस्त थे.सलीम और जावेद इस नये कलाकार अमजद खान  को अवसर देने के लिए निर्देशक रमेश सिप्पी से आग्रह किया,जिसे इन्होनें एक नाटक में अभिनय करते देखा था.विलक्षण कलाकारों की मौजूदगी के बावजूद अमजद खान अभिनीत डाकू गब्बर सिंह सर्वाधिक लोक प्रिय पात्र फिल्म इतिहास में किंवदंती बन चुका है.
अपने 16 साल के फ़िल्मी कैरियर में अमजद खान ने लगभग 120 फिल्मो में काम किया.उनकी प्रमुख फिल्मे "आखिरी गोली","हम किसी से कम नही","चक्कर पे चक्कर","लावारिस","गंगा की सौगंध","बेसर्म","अपना खून","देश परदेश","कसमे वादे","क़ानून की पुकार","मुक्कद्दर का सिकंदर","राम कसम","सरकारी मेहमान","आत्माराम","दो शिकारी", "सुहाग","द ग्रेट गैम्बलर","इंकार","यारी दुश्मनी","बरसात की एक रात", "खून का रिश्ता","जीवा","हिम्मतवाला","सरदार","उत्सव" आदि है. जिसमे उन्होंने शानदार अभिनय किया.अमजद जी अपने काम के प्रति बेहद गम्भीर व ईमानदार थे.परदे पर वे जितने खूंखार और खतरनाक इंसानों के पात्र निभाते थे.लेकिन वे वास्तविक जीवन और निजी जीवन में वे एक भले हँसने हँसाने और कोमल दिल वाले इंसान थे.
फिल्म "शोले" की सफलता के बाद अमजद खान ने बहुत सी हिंदी फिल्मो में खलनायक की भूमिका की.70 से 80 और फिर 90 के दशक में उनकी लोकप्रियता बरक़रार रही.उन्होंने डाकू के अलावा अपराधियों के आका,चोरों के सरदार और हत्यारों के पात्र निभाए.उनकी ज्यादातर फिल्मों में अमिताभ ने हीरो की भूमिका निभाई है.बॉलीवुड में अमिताभ,अमजद और कादर खान तीनों की दोस्ती मशहूर थी.उन्होंने फिल्म "याराना" में अमिताभ के दोस्त और फिल्म "लावारिस"में पिता की भूमिका की थी.उन्होंने कुछ हास्य किरदार भी निभाए जिसमे फिल्म "कुर्बानी",लव स्टोरी" और "चमेली की शादी" में उनके कॉमिक रोल को खूब पसंद किया गया.80 के दशक में उन्होंने दो फिल्मे बनायीं थी.सन 1983 में "चोर पुलिस" जो कि सफल रही और 1985 में "अमीर आदमी गरीब आदमी"जो की बॉक्स ऑफिस पर फेल हो गयी थी.
अमजद खान जी ने सन 1972 में शैला खान से शादी कर ली थी.और कुछ वर्षों बाद उनके घर एक पुत्र हुआ शादाब खान जिन्होंने कुछ फिल्मे भी की.उनके एक पुत्री अहलाम खान और दूसरे पुत्र सीमाब खान है जो कि फिल्मों में नहीं आये.
कहते  है पात्र लेखक की कठुतालियाँ होते है.और भगवान की कठपुतली इंसान है.जिसका समय पूरा होता है.उसी की डोर खीच ली जाती है.गोवा जाते समय दुर्घटना के बाद अमजद जी का बच जाना किसी खुदा के करिश्में से कम न था.अमिताभ बच्चन ने उस संकट की घड़ी में अपना खून दिया और घंटो अस्पताल में प्रार्थना करते रहे.अमजद जी चंगे हुए,लेकिन वह मानसिक रूप से थोड़ा कमजोर हो गए.किन्तु इसी बीच उनके पिता का भी देहांत हो गया.जिससे परिवार का सारा बोझ उन्ही के कंधो पर आ गया,साथ ही वह कारटीजोन नामक बीमारी के प्रभाव में आकार मोटे हो गए.जिससे वह दिन भर में केवल शुद्ध दूध और शक्कर की सौ प्याली चाय की आदत हो गयी.इससे वजन बढ़ता गया और बेचरा दिल कब तक,कहाँ तक दम मारता और अंततः 27 जुलाई 1992 को भारतीय फिल्म का यह सितारा ह्रदय गति रुकने से सदा के लिए अस्त हो गया.लेकिन जब भी हिंदी फिल्मों के विलेन की चर्चा होगी तो गब्बर सिंह यानि अमजद खान जी के नाम सबसे पहले लिया जायेगा..............
 






1 comments:

Arunesh c dave said...

अमजद खान अपने समय के सर्वकालिक खलनायक हुये और उनका स्थान दिलो मे हरदम रहेगा

Post a Comment