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Monday, 11 July 2011

गुरुदत्त :दर्द की दास्तान

वेहमेशा उदासी और दर्द की गलियों में ही नहीं भटकते रहे.फिल्म 'मिस्टर और मिसेज 55'{1955}के शरारती कार्टूनिस्ट बने और फिल्म 'आर-पार'{1954}बेफिक्र टैक्सी ड्राइवर भी,लेकिन 'प्यासा'{1957} और 'कागज के फूल'{1959}की उदासी ही सिनेमा की दुनियां में हमेशा याद की जायेगी.वे एक बेमिसाल फिल्मकार थे.हाँ,आज हम बात कर रहे है गुरुदत्त साहब की,जो एक ऐसे इंसान थे,जो कभी भी अपनी कामयाबी पर इतराते नहीं थे और न ही नाकामयाबी से घबराते थे.उन्होंने सबसे अलग हटकर फिल्में बनायीं.दक्षिण एशिया में जो एक साफ़ सुथरा,लोकप्रिय और मनोरंजक सिनेमा 1950 के दशक में उभरा उसमें गुरुदत्त का केन्द्रीय योगदान था.वह बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे.उनकी फिल्मों को स्रजनात्मकता और कलात्मकता के लिए हमेशा याद रखा जायेगा.
गुरुदत्त साहब  का जन्म 9 जुलाई  1925 को   कर्नाटक  के                          कनारा    जिले में हुआ  था .उनका पूरा नाम वसंत कुमार शिवशंकर रावपादुकोण था.इनके पिता का नाम शिवशंकर राव पादुकोण जो कि पेशे से अध्यापक थे जिन्होंने बाद में बैंक की  नौकरी कर ली थी.और इनकी माता का नाम वैसांथी पादुकोण था.गुरुदत्त को बचपन से ही आर्थिक दिक्कतों का सामना करना पड़ा,जिससे इनकी शिक्षा प्रभावित हो गयी.और एक बच्चे के रूप में इनका अनुभव बहुत ही बुरा रहा.अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद गुरुदत्त ने अल्मोड़ा स्थित उदय शंकर नृत्य अकादमी में नृत्य का प्रशिक्षण लिया और कलकत्ता चले गए. वहाँ पर उन्होंने एक टेलीफोन ऑपरेटर की नौकरी कर ली.लेकिन कुछ समय बाद उनका मन नौकरी से उब गया और वह नौकरी छोड़कर बम्बई{अब मुंबई}वापस अपने माता-पिता के पास आ गए. 
साल  1944 में अपने चाचा की मदद से पुणे चले गए और प्रभात स्टूडियो से जुड गए ,जहाँ पर उन्होंने पहले अभिनेता और फिर नृत्य निर्देशक के रूप में अपना काम शुरू किया.यही उनकी मुलाकात कई हिंदी सिनेमा की फ़िल्मी हस्तियों के साथ हुई. और यही से वह पहली बार देवानंद जी के सम्पर्क में आये.इसके कुछ दिन बाद वह पुणे से बम्बई वापस लौट आये.और फिल्म निर्माण और अभिनय की शुरुवात की.मित्र देवानंद की संस्था नवकेतन के दूसरी फिल्म 'बाजी'{1951}का सम्पूर्ण निर्देशन दुरुदत्त जी सौप दिया गया.इस फिल्म में देवानंद मुख्य भूमिका में थे और हिरोइन थी पाश्र्वगायिका गीता राय,जिन्होंने बाद में गुरुदत्त जी से शादी करके गीतादत्त हो गयी थी.यह फिल्म बहुत ही कामयाब रही.इसके बाद गुरुदत्त देवानंद को लेकर एक और फिल्म बनाई 'जाल'{1952}जिसमें उनके साथ जानीवाकर साहब भी थे.जो आज तक के सभी हास्य अभिनेताओ में साफ-सुथरे अभिनेता के रूप में स्वीकृत हुए है.इसके बाद साल 1953 में बनी फिल्म 'बाज'बॉक्स ऑफिस पर ओंधे मुह गिर गयी,जिसका गुरुदत्त साहब को बहुत अफ़सोस हुआ.
इसके  बाद गुरुदत्त जी ने कई हिट बनाई,इसमें से 'आर-पार'{1954},'सी.आई.डी.'{1956},और 'मिस्टर और मिसेज 55'{1955}का संगीत भी जबरदस्त हिट हुआ.लोग आज भी पसंद करते है.बहुमुखी प्रतिभा के धनी गुरुदत्त साहब का अंतिम लक्ष्य कई बड़ी हिट फिल्में बनना था.और उन्होंने 'प्यासा'{1957},'कागज के फूल'{1959},'चौदवीं का चाँद'{1960},'साहब बीबी और गुलाम'{1962}जैसी कई बड़ी यादगार फिल्मों का निर्माण किया.फिल्म 'प्यासा'के बाद वहीदा रहमान और गुरुदत्त की जोड़ी फ़िल्मी परदे के साथ-साथ परदे के पीछे काफी चर्चित हो गयी.बॉलीवुड में इनके रूमानी रिश्ते काफी चर्चा होने लगी थी.गुरुदत्त जी ने करीब 20 फिल्मो का निर्माण किया,जिसमे'बाजी'{1951},'जाल'{1952},'सी.आई.डी.'{1956},'प्यासा'{1957},
'सैलाब'{1956},'बहारे फिर भी आएगी'{1966},'साँझ और सवेरा'{1964}, 'बहुरानी'{1963},'12o'क्लाक'{1958},'हम एक है'{1946},'लाखारानी' {1945},'चाँद'{1944}आदि प्रमुख है.
गुरुदत्त  साहब जब अपने कैरियर के उफान पर थे तब उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया.10 अक्टूबर 1964 को उनका निधन हो गया,लेकिन आज भी उनकी मौत का रहस्य बरकार है.क्योकि कुछ लोग कहते है कि उन्होंने खुदखुशी की थी.'साँझ और सवेरा'उनकी आखिरी फिल्म थी.'कागज के फूल'और'प्यासा'को टाइम पत्रिका ने 100 सर्व कालीन फिल्मों में शुमार किया है.और वह एशिया के 25 सर्वश्रेष्ठ अभिनेताओं में भी शामिल किया है.
गुरदत्त साहब अपने फिल्मांकन चहरे को नजदीक से दिखाने,रोशनी और साये का तालमेल,नाटकीयता की समझ और संगीत के इस्तेमाल के लिए हमेशा याद क्या जायेगा और हाँ साथ ही याद किये जायेगें कि उन्होंने अपनी पसंदीदा हिरोइन वहीदा रहमान के अनिंद्य सौंदर्य को किस तरह परदे पर दिखाया.....................वक्त ने उन्हें वक्त से पहले ही इस दुनियां से दूर कर दिया.उन्होंने सही कहा है...वक्त ने किया क्या हसी सितम .......................................                                                           
                                    

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