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Tuesday, 26 July 2011

अमजद खान : बॉलीवुड के गब्बर सिंह

    यूँतो बॉलीवुड में समय-समय कई अभिनेताओ ने डाकुओ के पात्र में अभिनय किया है और वाहवाही बटोरी है.लेकिन सन 1975 में प्रदर्शित फिल्म "शोले"के पात्र डाकू गब्बर सिंह पूरे देश में तब से लेकर आज तक लोकप्रिय है.और बोलने,चलने-फिरने,हँसने और खैनी फांकने की अदा आज 38 साल बाद भी हम सभी के दिलो दिमाग में बसी है.और समय-समय पर कई अभिनेताओ ने लोकप्रियता पाने के लिए इस पात्र की अदा की नक़ल भी की. डाकू गब्बर सिंह पात्र को परदे पर जीवंत बनाने वाले चमत्कारिक अभिनेता थे-अमजद खान.अमजद खान भले ही आज इस दुनियां में नहीं है,लेकिन डाकू गब्बर सिंह आज भी फ़िल्मी परदे पर जिन्दा है. 
इस  चमत्कारिक अभिनेता का जन्म 12 नवम्बर 1940 को फिल्मों के जाने माने अभिनेता जिक्रिया खान के पठानी परिवार में आन्ध्रप्रदेश के हैदराबाद शहर में हुआ था.इनके पिता बॉलीवुड में जयंत के नाम से काम करते थे.बचपन से ही अमजद खान को अभिनय से लगाव हो गया और थियटर से जुड़ गए.अमजद खान की पहली फिल्म बतौर बाल कलाकार "अब दिल्ली दूर नहीं"{1957},थी,जब वह केवल 17 साल के थे.
अमजद खान पढाई पूरी करने के बाद निर्देशक के.आसिफ के साथ असिस्टेंट के रूप में काम करने लगे.बतौर कलाकार अमजद खान की पहली फिल्म "मुहब्बत और खुदा"थी,जिसमें वह अभिनेता संजीव कुमार के गुलाम की भूमिका की थी.इस बारे में बहुत कम लोग जानते है कि बतौर अभिनेता उनकी पहली फिल्म "शोले"नहीं थी.
गांधी के इस देश में गब्बर सिंह की लोकप्रियता अबूझ पहेली है.फिल्म "शोले"एक बहुत बड़ी फिल्म थी.जब निर्देशक रमेश सिप्पी ने अमजद खान जैसे नये अभिनेता को फिल्म के लिए चुना तो उनके साथियों ने कहा अमजद खान जैसा नया लड़का अमिताभ,धर्मेन्द्र और संजीव कुमार जैसे धुरंधर अभिनेताओ के सामने टिक नहीं पायेगा.हांलाकि पहले इस भूमिका के लिए निर्देशक रमेश सिप्पी डैनी डेन्जोप्पा को लेना चाहते थे.लेकिन वह फिरोज खान की फिल्म "धर्मात्मा"में व्यस्त थे.सलीम और जावेद इस नये कलाकार अमजद खान  को अवसर देने के लिए निर्देशक रमेश सिप्पी से आग्रह किया,जिसे इन्होनें एक नाटक में अभिनय करते देखा था.विलक्षण कलाकारों की मौजूदगी के बावजूद अमजद खान अभिनीत डाकू गब्बर सिंह सर्वाधिक लोक प्रिय पात्र फिल्म इतिहास में किंवदंती बन चुका है.
अपने 16 साल के फ़िल्मी कैरियर में अमजद खान ने लगभग 120 फिल्मो में काम किया.उनकी प्रमुख फिल्मे "आखिरी गोली","हम किसी से कम नही","चक्कर पे चक्कर","लावारिस","गंगा की सौगंध","बेसर्म","अपना खून","देश परदेश","कसमे वादे","क़ानून की पुकार","मुक्कद्दर का सिकंदर","राम कसम","सरकारी मेहमान","आत्माराम","दो शिकारी", "सुहाग","द ग्रेट गैम्बलर","इंकार","यारी दुश्मनी","बरसात की एक रात", "खून का रिश्ता","जीवा","हिम्मतवाला","सरदार","उत्सव" आदि है. जिसमे उन्होंने शानदार अभिनय किया.अमजद जी अपने काम के प्रति बेहद गम्भीर व ईमानदार थे.परदे पर वे जितने खूंखार और खतरनाक इंसानों के पात्र निभाते थे.लेकिन वे वास्तविक जीवन और निजी जीवन में वे एक भले हँसने हँसाने और कोमल दिल वाले इंसान थे.
फिल्म "शोले" की सफलता के बाद अमजद खान ने बहुत सी हिंदी फिल्मो में खलनायक की भूमिका की.70 से 80 और फिर 90 के दशक में उनकी लोकप्रियता बरक़रार रही.उन्होंने डाकू के अलावा अपराधियों के आका,चोरों के सरदार और हत्यारों के पात्र निभाए.उनकी ज्यादातर फिल्मों में अमिताभ ने हीरो की भूमिका निभाई है.बॉलीवुड में अमिताभ,अमजद और कादर खान तीनों की दोस्ती मशहूर थी.उन्होंने फिल्म "याराना" में अमिताभ के दोस्त और फिल्म "लावारिस"में पिता की भूमिका की थी.उन्होंने कुछ हास्य किरदार भी निभाए जिसमे फिल्म "कुर्बानी",लव स्टोरी" और "चमेली की शादी" में उनके कॉमिक रोल को खूब पसंद किया गया.80 के दशक में उन्होंने दो फिल्मे बनायीं थी.सन 1983 में "चोर पुलिस" जो कि सफल रही और 1985 में "अमीर आदमी गरीब आदमी"जो की बॉक्स ऑफिस पर फेल हो गयी थी.
अमजद खान जी ने सन 1972 में शैला खान से शादी कर ली थी.और कुछ वर्षों बाद उनके घर एक पुत्र हुआ शादाब खान जिन्होंने कुछ फिल्मे भी की.उनके एक पुत्री अहलाम खान और दूसरे पुत्र सीमाब खान है जो कि फिल्मों में नहीं आये.
कहते  है पात्र लेखक की कठुतालियाँ होते है.और भगवान की कठपुतली इंसान है.जिसका समय पूरा होता है.उसी की डोर खीच ली जाती है.गोवा जाते समय दुर्घटना के बाद अमजद जी का बच जाना किसी खुदा के करिश्में से कम न था.अमिताभ बच्चन ने उस संकट की घड़ी में अपना खून दिया और घंटो अस्पताल में प्रार्थना करते रहे.अमजद जी चंगे हुए,लेकिन वह मानसिक रूप से थोड़ा कमजोर हो गए.किन्तु इसी बीच उनके पिता का भी देहांत हो गया.जिससे परिवार का सारा बोझ उन्ही के कंधो पर आ गया,साथ ही वह कारटीजोन नामक बीमारी के प्रभाव में आकार मोटे हो गए.जिससे वह दिन भर में केवल शुद्ध दूध और शक्कर की सौ प्याली चाय की आदत हो गयी.इससे वजन बढ़ता गया और बेचरा दिल कब तक,कहाँ तक दम मारता और अंततः 27 जुलाई 1992 को भारतीय फिल्म का यह सितारा ह्रदय गति रुकने से सदा के लिए अस्त हो गया.लेकिन जब भी हिंदी फिल्मों के विलेन की चर्चा होगी तो गब्बर सिंह यानि अमजद खान जी के नाम सबसे पहले लिया जायेगा..............
 






Saturday, 23 July 2011

मुकेश : ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना....

  वेमोहम्द रफ़ी,मन्ना डे और किशोर कुमार जैसे महान गायकों के समकालीन थे.तथा 60 से 70 दशक की हिंदी फिल्मों में अपनी आवाज के जरिये छाये रहे.वे अभिनेता राजकपूर की आवाज बन गए थे.इन्होनें अभिनेता राजकपूर अभिनित अधिकतर फिल्मों में राजकपूर के लिए अपनी आवाज दी.इनके निधन पर राजकपूर जी ने स्वयं कहा था आज मैंने अपनी आवाज खो दी है.हाँ आज हम बात करने वाले है.हिंदी फिल्मों के महान गायक  मुकेश जी की.हिंदी फिल्म जगत में मुकेश जी अपनी अलग तरह की आवाज के लिए हमेशा याद किये जायेगें.उनकें गीत आज भी लोगो को सुकून देते है.उनकी आवाज उनके देहांत के करीब 36 साल बाद भी श्रोताओं के दिल में बसी है.
मुकेश जी का पूरा नाम मुकेश चन्द्र माथुर था.वह 22 जुलाई 1923 को एक मध्यम वर्गीय परिवार में जन्में थे.उन्हें अभिनय और गायन का बचपन से ही शौक था और वे गायक के.एल.सहगल के प्रशंसक थे.मात्र दसवीं तक पढने के बावजूद उन्हें लोक निर्माण कार्य में सहायक सर्वेक्षण विभाग में नौकरी मिल गयी.जहाँ पर उन्होंने केवल सात महीने तक काम किया.पर शायद किस्मत को कुछ और मंजूर था.दिल्ली में उन्होंने चुपके से कई गैर  फ़िल्मी गानों की रिर्काडिंग करी.इसी गायकी और अभिनय के शौक ने उन्हें दिल्ली छोड़कर मुंबई आने पर विवश कर दिया और वे फिल्म स्टार बनने के लिए नौकरी छोड़कर मुंबई आ गए.और वे अपने रिश्तेदार व प्रसिद्ध कलाकार मोतीलाल के यहाँ ठहरने लगे.
मुकेश ने यूं तो अपने कैरियर की शुरुवात 1941 में फिल्म 'निर्दोष' में अभिनेता-गायक के तौर पर की,लेकिन पार्श्वगायक के तौर पर उन्हें अपना पहला काम साल 1945 में फिल्म 'पहली नजर' में मिला.इसके संगीतकार अनिल विश्वास जी थे{इनके बारे में फिर कभी बात होगी}.हिंदी फिल्म में जो पहला गाना मुकेश जी गाया था वह था "दिल जलाता है तो जलने दो...."जिसमे अदाकारी मोतीलाल जी ने की थी.इस गीत में मुकेश जी के आदर्श गायक के.एल.सहगल का प्रभाव साफ दिखा.इसी गीत के बाद उनका पहला युगल गीत फिल्म 'उस पार' में गायिका कुसुम के साथ "ज़रा बोली री हो...."था.फिर उन्होंने फिल्म 'मूर्ति'में "बदरिया बरस गयी उस पार....."खुर्शीद के साथ गाया.उस समय तक उन्होंने सुनने वालो के मन में अपनी जगह बना ली थी.इसके बाद उन्होंने फिल्म 'आग' 'अनोखी अदा' और 'मेला' में लोगो ने सुना और उनकी आवाज के जादू से देश के सभी श्रोता मंत्रमुग्ध हो गए.
 साल 1949 में उन्होंने एक और मील का पत्थर पार किया वो था उनका ,महान अभिनेता राजकपूर और महान संगीत कार शंकर जयकिशन का मिलना.राजकपूर जी उनसे और शंकर जयकिशन जी से अपने आर.के.फिल्म्स के लिए गानों की फरमाईश करते रहते थे.उसके बाद तो 'आवारा' और 'श्री 420'जैसी फिल्मो में गए गए गाने "आवारा हूँ......" व "मेरा जूता है जापानी ......." से  उनकी    आवाज देश ही नहीं विदेश में भी शोहरत पायी.रूस में तो "आवारा हूँ ....."सड़को पर सुनाई देने लगा था.'आह''आवारा''बरसात''श्री 420''अनाड़ी''जिस देश में गंगा बहती है'संगम''मेरा नाम जोकर' व कुछ अन्य राजकपूर जी फिल्मों में मुकेश जी द्वारा गाये गए गाने आज भी तरो-ताजा लगते है.
अब थोड़ी बात मुकेश जी के गृहस्थ जीवन की जाय.मुकेश जी ने सरल जी से साल 1946 में शादी कर ली थी.मुकेश जी के एक बेटा और दो बेटियां है जिनके नाम-नितिन मुकेश,रीटा और नलिनी.जिसमे नितिन मुकेश ने अपने पिता मुकेश के तरह गायकी में हाथ आजमाया और लोगो ने काफी पसंद किया.
साल 1976 में अगस्त महीने के अंतिम सप्ताह में मुकेश जी एक कार्यक्रम के सिलसिले में अमेरिका के मिशिगन गए.वही उनका 27 अगस्त 1976 को दिल का दौरा पड़ने से देहांत हो गया.उनकी मृत्यु के पश्चात भी उनके द्वारा गाये गये गानों से सजी कई फिल्मे रिलीज हुई ये फ़िल्में 'धरमवीर''सत्यम शिवम सुन्दरम''अमर अकबर एंथोनी''खेल खिलाडी का''दरिंदा' प्रमुख थी.लोगो ने इनके गीतों में मुकेश की आवाज को खूब पसंद किया.मुकेश के द्वारा गाई गई 'तुलसी रामायण'आज भी लोगो के भक्ति भाव से झूमने को मजबूर कर देती है.करीब 200 से अधिक फिल्मों में आवाज देने वाले मुकेश ने संगीत की दुनियां में अपने आपको को दर्द का बादशाह तो साबित किया ही इसके साथ-साथ वैश्विक गायक के रूप में अपनी पहचान बनाई.फिल्म फेयर पुरूस्कार पाने वाले वह पहले पुरूष गायक थे.
केवल 56 साल की उम्र में इस दुनियां से अलविदा कहने वाले इस महान गायक की आवाज सुनकर दुनियां वाले शायद यही कहेगें.........."मै न भूलूँगा..."







 

Thursday, 14 July 2011

मदन मोहन : मेरा साया साथ होगा...

स्वर साम्राज्ञी लता जी उनके संगीत की कायल थी और उन्हें संगीत का शहजादा कहा करती थी,महान संगीतकार यस.डी.बर्मन ने भी कहा था कि उन जैसा संगीतकार दुनिया में मिलना मुश्किल है,उनके एक गीत 'आपकी नजरो ने समझा प्यार के काबिल मुझे ......' के संगीत से मशहूर संगीतकार नौशाद इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने इस धुन के बदले उन्हें अपनी सारी धुनें देने की ख्वाहिश जाहिर की थी.हाँ अपने बिलकुल ठीक समझा आज मै बात करने वाला हूँ महान संगीतकार मदन मोहन जी की....आज भी उनकी कशिश भरी आवाज और उतना ही उम्दा संगीत रूह में समा जाने वाला है.लोग उनके संगीत के दीवाने थे.                                                             सन 1950 से 1970 तक के तीन दशको में संगीत की धूम मचाने वाले इस महान संगीतकार का पूरा नाम मदन मोहन कोहली था.मदन मोहन जी का जन्म 25 जून 1924 को बग़दाद,इराक में हुआ था.जहाँ इनके पिता राय बहादुर चुन्नीलाल इराकी पुलिस के साथ एक एकाउंटेंट जनरल के रूप में काम करते थे.मध्य पूर्व में जन्मे मदन मोहन जी ने अपने जीवन के पहले पाँच साल यही पर बिताए.भारत आने के बाद पिता राय बहादुर चुन्नीलाल फिल्म व्यवसाय से जुड़ गए. तथा बाम्बे टाकीज और फिल्मिस्तान जैसे बड़े स्टूडियो में साझीदार बन गए.घर में फिल्मी माहौल होने के कारण मदन मोहन भी फिल्मो में काम करके बड़ा नाम कमाना चाहते थे,लेकिन पिता के कहने पर उन्होंने सेना में भर्ती होने का फैसला ले लिया और देहरादून में सेना की नौकरी शुरू कर दी.कुछ दिनों बाद उनका तबादला दिल्ली हो गया.लेकिन कुछ दिनों बाद उनका मन नौकरी में न लगा,उनका मन संगीत की तरफ खिच रहा था.इसलिए नौकरी छोड़ कर लखनऊ आ गए और लखनऊ आकाशवाणी में नौकरी कर ली.आकाशवाणी में उनकी मुलाकात संगीत जगत से जुड़े उस्ताद फैयाज खां,उस्ताद अली अकबर बेगम और तलत महमूद जैसी जानीमानी हस्तियों से हुई.जिससे इनका मन पूर्ण रूप से संगीत की ओर हो गया.और वह अपने को नया रूप देने के लिए लखनऊ से बम्बई {अब मुंबई}आ गए.
और  सबसे पहले उन्हें ख्याति प्राप्ति संगीतकारों सी.रामचंद्र और यस.डी.बर्मन के सहायक के रूप में काम करने का मौका मिला.इसके बाद उन्हें पहली बार सन 1950 में देवेन्द्र गोयल द्वारा निर्देशित फिल्म 'आखें' के लिए बतौर संगीतकार अपनी धुनें दी.फिल्म 'आखें'के बाद स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर मदन मोहन की चहेती पाश्र्व गायिका बन गयी.और वह अपनी हर फिल्म के लिए लता जी से ही गाने की गुजारिश किया करते थे.लता जी भी उनके संगीत निर्देशन से काफी प्रभावित थी और आपकी नजरों ने समझा .....,मेरा साया साथ होगा.....,नैना  ओ  बरसे  नैनो  में  बदरा  छाय.....,माई री मै कासे कहूँ ...,अगर मुझसे मोहबब्त है खेलो न मेरे दिल से ....,लग जा गले न तुम वेवफा हो......,वो भूली दास्ताँ ....सहित लगभग 210 गाने मदन मोहन जी की धुन पर गाये.और मदन मोहन जी के पसंदीदा गीतकार के तौर पर राजा मेहंदी अली खान,राजेंद्र कृष्ण और कैफी आजमी का नाम सबसे पहले आता है.लता जी ने गीतकार राजेंद्र किशन के लिए मदन मोहन जी की धुन पर कई गीत गए है.जिसमें यू हसरतो के दाग.......'अदालत'{1958},सपने में सजन दो बातें .....'गेटवे ऑफ इंडिया'{1957},मैंने तो तुम संग नैन .......'मनमौजी',भूली वो दास्तां......'संयोग'{1961},जैसे सुपरहिट गीत उन तीनों फनकारो की तिगड़ी बेमिसाल है.फिल्म 'हंसते जख्म' का गीत आज सोचा तो आँसू भर आये......गाते वक्त लता जी रो पड़ी थी.मदन मोहन जी के संगीत निर्देशन में आशा भोसले ने फिल्म 'मेरा साया'के लिए झुमका गिरा रे बरेली के बाजार में ....गाना गया जिसको सुनकर श्रोता आज भी झूम उठते है                                                                                                    वर्ष1970 में प्रदर्शित फिल्म 'दस्तक'के लिए मदन मोहन जी को सर्वश्रेष्ठ संगीत का पुरस्कार देकर सम्मानित किया गया.तीन दशक लंबे अपने फ़िल्मी कैरियर में उन्होंने लगभग 100 फिल्मों के लिए संगीत दिया.सुपर हिट संगीत देने वाले मदन मोहन जी ने अपने जीवन में कई उतार-चढाव देखे.यह एक दुर्भाग्य था कि उन्होंने जिन फिल्मों में संगीत दिया,उनमें से अधिकतर बॉक्स ऑफिस पर टिक न सकी लेकिन उनका संगीत हर व्यक्ति को सम्मोहित कर लेता था.फ़िल्मी दुनिया के स्वार्थ व धोखेबाजी से उन्हें कई बार काफी नुकसान हो गया.जिसके कारण वह शराब के आदी हो गए.अंततः मधुर संगीत लहरियों से श्रोताओ के दिल में खास जगह बना लेने वाले मदन मोहन जी 14 जुलाई 1975 को इस दुनिया से जुदा हो गए.उनकी मौत के बाद उनके संगीत निर्देशन में बनी फिल्म 'मौसम'और 'लैला मजनूं'रिलीज हुई,जिसके संगीत का जादू आज भी श्रोताओ को मंत्रमुग्ध कर देता है.वर्ष 2004 में यश चोपड़ा की फिल्म 'वीर जारा'में मदन मोहन जी की उन धुनों को लिया गया,जिन्हें वे अपने जीते जी नहीं कर सके......संगीतकार के अलावा वे एक अच्छे गायक भी थे.आज भले ही यह महान संगीतकार हम सभी के बीच नहीं है,लेकिन यह संगीत का सितारा सदा ही अपनी धुनों के लिए हम सभी के दिलो में चमकता रहेगा.............   

                                                       
                                                                                                

Monday, 11 July 2011

गुरुदत्त :दर्द की दास्तान

वेहमेशा उदासी और दर्द की गलियों में ही नहीं भटकते रहे.फिल्म 'मिस्टर और मिसेज 55'{1955}के शरारती कार्टूनिस्ट बने और फिल्म 'आर-पार'{1954}बेफिक्र टैक्सी ड्राइवर भी,लेकिन 'प्यासा'{1957} और 'कागज के फूल'{1959}की उदासी ही सिनेमा की दुनियां में हमेशा याद की जायेगी.वे एक बेमिसाल फिल्मकार थे.हाँ,आज हम बात कर रहे है गुरुदत्त साहब की,जो एक ऐसे इंसान थे,जो कभी भी अपनी कामयाबी पर इतराते नहीं थे और न ही नाकामयाबी से घबराते थे.उन्होंने सबसे अलग हटकर फिल्में बनायीं.दक्षिण एशिया में जो एक साफ़ सुथरा,लोकप्रिय और मनोरंजक सिनेमा 1950 के दशक में उभरा उसमें गुरुदत्त का केन्द्रीय योगदान था.वह बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे.उनकी फिल्मों को स्रजनात्मकता और कलात्मकता के लिए हमेशा याद रखा जायेगा.
गुरुदत्त साहब  का जन्म 9 जुलाई  1925 को   कर्नाटक  के                          कनारा    जिले में हुआ  था .उनका पूरा नाम वसंत कुमार शिवशंकर रावपादुकोण था.इनके पिता का नाम शिवशंकर राव पादुकोण जो कि पेशे से अध्यापक थे जिन्होंने बाद में बैंक की  नौकरी कर ली थी.और इनकी माता का नाम वैसांथी पादुकोण था.गुरुदत्त को बचपन से ही आर्थिक दिक्कतों का सामना करना पड़ा,जिससे इनकी शिक्षा प्रभावित हो गयी.और एक बच्चे के रूप में इनका अनुभव बहुत ही बुरा रहा.अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद गुरुदत्त ने अल्मोड़ा स्थित उदय शंकर नृत्य अकादमी में नृत्य का प्रशिक्षण लिया और कलकत्ता चले गए. वहाँ पर उन्होंने एक टेलीफोन ऑपरेटर की नौकरी कर ली.लेकिन कुछ समय बाद उनका मन नौकरी से उब गया और वह नौकरी छोड़कर बम्बई{अब मुंबई}वापस अपने माता-पिता के पास आ गए. 
साल  1944 में अपने चाचा की मदद से पुणे चले गए और प्रभात स्टूडियो से जुड गए ,जहाँ पर उन्होंने पहले अभिनेता और फिर नृत्य निर्देशक के रूप में अपना काम शुरू किया.यही उनकी मुलाकात कई हिंदी सिनेमा की फ़िल्मी हस्तियों के साथ हुई. और यही से वह पहली बार देवानंद जी के सम्पर्क में आये.इसके कुछ दिन बाद वह पुणे से बम्बई वापस लौट आये.और फिल्म निर्माण और अभिनय की शुरुवात की.मित्र देवानंद की संस्था नवकेतन के दूसरी फिल्म 'बाजी'{1951}का सम्पूर्ण निर्देशन दुरुदत्त जी सौप दिया गया.इस फिल्म में देवानंद मुख्य भूमिका में थे और हिरोइन थी पाश्र्वगायिका गीता राय,जिन्होंने बाद में गुरुदत्त जी से शादी करके गीतादत्त हो गयी थी.यह फिल्म बहुत ही कामयाब रही.इसके बाद गुरुदत्त देवानंद को लेकर एक और फिल्म बनाई 'जाल'{1952}जिसमें उनके साथ जानीवाकर साहब भी थे.जो आज तक के सभी हास्य अभिनेताओ में साफ-सुथरे अभिनेता के रूप में स्वीकृत हुए है.इसके बाद साल 1953 में बनी फिल्म 'बाज'बॉक्स ऑफिस पर ओंधे मुह गिर गयी,जिसका गुरुदत्त साहब को बहुत अफ़सोस हुआ.
इसके  बाद गुरुदत्त जी ने कई हिट बनाई,इसमें से 'आर-पार'{1954},'सी.आई.डी.'{1956},और 'मिस्टर और मिसेज 55'{1955}का संगीत भी जबरदस्त हिट हुआ.लोग आज भी पसंद करते है.बहुमुखी प्रतिभा के धनी गुरुदत्त साहब का अंतिम लक्ष्य कई बड़ी हिट फिल्में बनना था.और उन्होंने 'प्यासा'{1957},'कागज के फूल'{1959},'चौदवीं का चाँद'{1960},'साहब बीबी और गुलाम'{1962}जैसी कई बड़ी यादगार फिल्मों का निर्माण किया.फिल्म 'प्यासा'के बाद वहीदा रहमान और गुरुदत्त की जोड़ी फ़िल्मी परदे के साथ-साथ परदे के पीछे काफी चर्चित हो गयी.बॉलीवुड में इनके रूमानी रिश्ते काफी चर्चा होने लगी थी.गुरुदत्त जी ने करीब 20 फिल्मो का निर्माण किया,जिसमे'बाजी'{1951},'जाल'{1952},'सी.आई.डी.'{1956},'प्यासा'{1957},
'सैलाब'{1956},'बहारे फिर भी आएगी'{1966},'साँझ और सवेरा'{1964}, 'बहुरानी'{1963},'12o'क्लाक'{1958},'हम एक है'{1946},'लाखारानी' {1945},'चाँद'{1944}आदि प्रमुख है.
गुरुदत्त  साहब जब अपने कैरियर के उफान पर थे तब उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया.10 अक्टूबर 1964 को उनका निधन हो गया,लेकिन आज भी उनकी मौत का रहस्य बरकार है.क्योकि कुछ लोग कहते है कि उन्होंने खुदखुशी की थी.'साँझ और सवेरा'उनकी आखिरी फिल्म थी.'कागज के फूल'और'प्यासा'को टाइम पत्रिका ने 100 सर्व कालीन फिल्मों में शुमार किया है.और वह एशिया के 25 सर्वश्रेष्ठ अभिनेताओं में भी शामिल किया है.
गुरदत्त साहब अपने फिल्मांकन चहरे को नजदीक से दिखाने,रोशनी और साये का तालमेल,नाटकीयता की समझ और संगीत के इस्तेमाल के लिए हमेशा याद क्या जायेगा और हाँ साथ ही याद किये जायेगें कि उन्होंने अपनी पसंदीदा हिरोइन वहीदा रहमान के अनिंद्य सौंदर्य को किस तरह परदे पर दिखाया.....................वक्त ने उन्हें वक्त से पहले ही इस दुनियां से दूर कर दिया.उन्होंने सही कहा है...वक्त ने किया क्या हसी सितम .......................................