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Tuesday, 3 May 2011

वहीदा रहमान :चौदहवीं का चाँद

       वह  अपनी हर फिल्म में नये ढंग से तराशा हुआ नया अंदाज लेकर आई.न मांसल सौंदर्य,न अंग प्रदर्शन,न कोई सेक्स अपील और न ही कोई बाजारू हरकते.लेकिन हर बार फ़िल्मी दर्शको को लगा कि यह लड़की जानी-पहचानी सी है.साथ ही वह भावुकता और व्यवहारिता का अदभुत सौंदर्य समन्वय है.उनकी आवाज में कशिश थी.उनकें नृत्य के दर्शक दीवाने थे.मै आज जिस सिने तारिका की बात कर रहा हूँ उनका नाम है-वहीदा रहमान जी.फिल्मों में चाहे उनका अल्हड़ लड़की का रोल{फिल्म बीस साल बाद १९६२} हो या फिर गम्भीर नर्स का{फिल्म ख़ामोशी १९६९}.सभी रोल को उत्तमता से निभा लेने की उनमे अच्छी योग्यता थी.उन्होंने १९५७ में सोने के दिल वाली तवायफ गुलाबो की भूमिका निभाई थी,जो जद्दोजहद कर रहे शायर को शुकून पहुचती है.१९६५{गाइड}में उन्होंने रोजी की भूमिका निभाई,जो अपने नपुंसक पति से दामन छुडाकर अपने प्रेमी के साथ रहने लगती है.इस दौरान उन्होंने अनगिनत फिल्मों में साबित कर दिया कि उनकी अलौकिक सुंदरता पुरुषों को पागल कर सकती है.उनका ओज बनावटी नहीं था.इसी वजह से आज भी लगता है कि चौदहवीं का चाँद गाना उन्ही के लिखा था.
वहीदा रहमान का जन्म १४ मई सन् १९३६ में तमिलनाडु के चेंगाल्पट्टू के एक परम्परागत मुस्लिम परिवार में हुआ था.चार बहनों में वहीदा सबसे छोटी थी.उनके पिता म्युनिस्पिल कमिश्नर थे.इस वजह से बचपन से ही ट्रेविलिंग बहुत होती थी.यानि हर तीन या चार साल बाद उनके पिता का तबादला हो जाता था.मतलब एकदम खानाबदोश जिंदगी.इन तबादलो की वजह से वह यथोचित शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकी.और साथ ही वह बचपन में बीमार भी रहती थी.इसका असर उनकी कक्षा की हाजिरी पर भी पड़ता था.और कक्षा में उनकी हाजिरी कम ही हो सकी.लेकिन वहीदा जी को बचपन से ही नृत्य और अभिनय से बहुत ही लगाव था.नौ-दस साल की उम्र में ही वहीदा जी ने भारतनाट्यम सिखाना शुरू कर दिया था.
समय धीरे-धीरे गुजरता गया.एक-एक करके तीनों बड़ी बहनों की शादी हो गयी.और वहीदा जी घर में अकेली रह गयी.तो उन्होंने सोचा क्यों न कुछ  काम किया जाय.सन् १९६५ में उन्हें एक के बाद एक दो तेलगू फिल्म में काम करने का अवसर मिला,तमिल फिल्म 'रेजरुमलाई'यानि परिवर्तन के दिन को बहुत बड़ी सफलता मिली.वहीदा जी का नृत्य दर्शकों को इतना पसंद आया कि सिनेमा वाले दर्शको को खुश करने के लिए मध्यांतर के पहले आने वाला उनका नृत्य का हिस्सा फिल्म के अंत में दुबारा चलते थे.फिल्म पूरे सौ दिन तक चली.इसके बाद वहीदा जी का रुख हिंदी फिल्मों कि तरफ हुआ,सबसे पहले अवसर उन्हें गुरुदत्त जी ने अपनी फिल्म 'सी.आई.डी.'{१९५६}में खलनायिका का रोल दिया.'सी.आई.डी.'प्रदर्शित हुई तो तहलका मच गया.बनाया गया था,अपराध चित्र,हत्या का नाटक और उभर कर आया संगीत का जादू.इसके बाद वहीदा जी मुंबई की होकर रह गयी.
सी.आई.डी.की सफलता के बाद फिल्म प्यासा{१९५७}में वहीदा जी को हिरोइन का रोल मिला और इस फिल्म के बाद वहीदा जी और गुरुदत्त साहब का विफल प्रेम प्रसंग का आरम्भ हुआ.गुरुदत्त जी और वहीदा जी अभिनीत फिल्म 'कागज के फूल'{१९५९}की असफल प्रेम कथा उन दोनों के स्वयं के जीवन पर आधारित थी.दोनों कलाकारों ने फिल्म 'चौदहवीं का चाँद'{१९६०}और 'साहिब बीबी और गुलाम'{१९६२}में साथ-साथ काम किया,जो बहुत ही सफल हुई.
सन् १९६३ में वहीदा जी और गुरुदत्त साहब के बीच मनमुटाव हो गया और दोनों अलग हो गए.इसके बाद सन १९६४ में गुरुदत्त जी ने आत्महत्या कर ली.वही वहीदा रहमान ने २७ अप्रैल १९७४ को कमलजीत सिंह,जो कि फिल्म 'शगुन'{१९६४}में उनके साथ हीरो थे,से विवाह कर लिया. 
वहीदा रहमान जी ने लगभग ७५ से अधिक फिल्मो में शानदार अभिनय से लोगो का मनोरंजन किया है.जिसमें से 'गाइड'{१९६५},'नीलकमल'{१९६८},'ख़ामोशी'{१९६९},'राखी'{१९६२},'दिल दिया दर्द  लिया'{१९६६},'तीसरी कसम'{१९६६},'राम औरश्याम'{१९६७},'प्रेमपुजारी'{१९७०},'मनमंदिर'{१९७१},'कभीकभी'{१९७६},'कुली'{१९८३},'लम्हे'{१९९१},'ओम जय जगदीश'{२००२}, 'दिल्ली-६'{२००९}उनकी उल्लेखनीय फ़िल्में है.
वहीदा पहली लड़की थी जिसने हिन्दुस्तानी सिनेमा की इस धारणा को  तोड़ा कि दक्षिण से आने वाली अभिनेत्री को सिवाय नाचने और कुछ नहीं आता.उनके भावभीने और मार्मिक अभिनय का जादू निर्माता-निर्देशकों के सिर पर इस कदर हावी रहा कि वे इस लाजवाब नृत्यांगना का ढंग से इस्तेमाल कारन ही भूल गए थे.सन् १९६६ में फिल्म गाइड के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का फिल्म फेयर अवार्ड दिया गया.सन् १९९४ में  फिल्म सिनेमा में उनके योगदान के लिए उन्हें फिल्म फेयर लाइफ टाइम अचीव मेंट से सम्मानित किया गया.भारत सरकार द्वारा सन् १९७२ में पदम श्री और २०११ में उन्हें पदम भूषन से सम्मानित किया गया.  
'वक्त ने किया क्या हसी सितम'-वहीदा जी ने चोटी की नायिकाओ के  क़तार में दो दशक शान और सम्मान के साथ गुजरे थे.वे दिन,वे लोग अब यांदों में सिमट गए.लेकिन यह नायिका अभी भी  रुपहले परदे पर कभी-कभी नजर आ जाती है.और शायद यही कहती है......तोड़ के बंधन बाँधी पायल.        

1 comments:

Markand Dave said...

प्रिय श्रीपुष्करजी,

आपने बहुत अच्छा आलेख लिखा है,आपको ढ़ेरों बधाई।

मौत की आहट (गज़लनुमा गीत)
मेरा ब्लॉग-
http://mktvfilms.blogspot.com/2011/05/blog-post_9627.html

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