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Saturday, 16 April 2011

बॉब क्रिस्टो: सॉरी बजरंग बाली

    र से गंजे,हाथ में वाइन का ग्लास और स्टाइलिस्ट विदेशी लिबाज में वह फ़िल्मी परदे पर नजर आते थे.उनके हिंदी संवाद को विदेशी लहजे में बोलने का अंदाज लोगो को खूब भाता था.हाँ मै आज बात कर रहा हूँ फिल्म अभिनेता बॉब क्रिस्टो की.बॉब हिंदी फिल्मो में खलनायक या ब्रिटिश अपसर की भूमिका में नजर आते थे.
आस्ट्रेलियाई  मूल बॉब का जन्म सिरका में १९३८ में हुआ था.इनका असली नाम रॉबर्ट जॉन क्रिस्टो था.लेकिन वह हिंदी सिनेमा में बॉब क्रिस्टो के नाम से मशहूर थे.बॉब मूल रूप से इंजीनियर थे,लेकिन अच्छी कदकाठी के बदौलत उन्हें माडलिंग के कई ऑफर मिल चुके थे.आस्ट्रेलियाइ मूल के बॉब भारत में जानी-मानी अभिनेत्री परवीन बॉबी से मिलने आये थे.और वह यही के होकर रह गए.बॉब को पहला ब्रेक संजय खान द्वारा निर्मित फिल्म 'अब्दुल्ला'{१९८०} में बतौर खलनायक मिला.जिसमें उनके अभिनय की खूब तारीफ की गयी.इसके बाद बॉब ने भारत में ही रुकने का निर्यण किया.और दो दशको तक करीब २०० हिंदी फिल्मों में मुख्य खलनायक या उसके सहायक के किरदार में अभिनय करते नजर आये.बॉब ने हिंदी फिल्मों के अलावा तमिल,तेलगु और कन्नड़ फिल्मों में भी काम किया.बॉब को ज्यादा बड़े रोल नहीं मिले लेकिन फिर भी वह अपनी पहचान गढने में कामयाब रहे.उन्होंने उस दौर में सुपर स्टार अमिताभ बच्चन से लेकर तमिल स्टार रजनीकांत के साथ काम किया.फिल्म 'मिस्टर इंडिया'{१९८७}का मिस्टर वोल्कोट वाला किरदार आज भी लोगो की जेहन में है,जिसमें उनके द्वारा बोला गया डॉयलाग 'जय बजरंग बली' व 'सॉरी बजरंग बली' पर उन्होंने खूब वाहवाही बटोरी.
कुर्बानी'{१९८०}'कालिया'{१९८१}, 'नास्तिक'{१९८३}, 'मर्द' {१९८५}, 'गिरिफ्तार' {१९८५}, 'मिस्टर इंडिया'{१९९३}, 'गुमराह'{१९९३} और 'प्रेम'{१९९५}आदि फिल्मों में उनकी भूमिका को काफी सराहा गया.इस नयी सदी में उन्होंने कुछ गिनी चुनी फ़िल्में 'वीर सावरकर'{२००१},'कसम'{२००१},'अमन के फ़रिश्ते'{२००३}की.और फिल्मों से दूर हो गए तथा बेंगलूर में वह योगा इंस्ट्रक्टर के रूप में जीवन यापन करने लगे.लेकिन अभिनय के शौकीन यह सितारा अक्षय कुमार की फिल्म से हिंदी फिल्मों में वापसी करना चाहता था.लेकिन यह हो न पाया,क्योकि यह फ़िल्मी सितारा इस दुनिया से २० मार्च २०११ को सदा के लिए अस्त हो गया.७२ वर्ष के बॉब को दिल का दौरा पड़ा और बेंगलूर में ही उनका निधन हो गया.अब उनके परिवार में उनकी पत्नी नरगिस तथा दो पुत्र सुनील व दोरियस है.हाल ही में उनके जीवन पर आधारित किताब 'फ्लैश बैक माइ टाइम्स इन बॉलीवुड एण्ड वियांडको'अभिनेता अक्षय कुमार लांच करने वाले थे.जो अब जून में लंच होगी.
बॉब ३६ वर्ष तक भारत में रहे,जर्मन और आस्ट्रेलियन भाषा बोलने वाले बॉब ने हिंदी फिल्मों में अभिनय के लिए ही हिंदी और उर्दू भाषा  भी सीखी थी.हिंदी फिल्मों का यह अभिनेता भले ही आज इस दुनियां न हो,लेकिन वह हम सब के दिलो व फ़िल्मी परदे पर हमेशा जिन्दा रहेगा और यही कहते दिखेगा...............सॉरी बाजरंग बली.
 
 

Friday, 15 April 2011

प्राण :हरफनमौला

 
   तलवार  जैसी मूंछे,उन पर फबने वाले हैटऔर परदे पर जोर दार उपस्थिति,वे बहुत ही स्टाइलिस्ट शख्स थे,हाँ मै बात कर रहा हूँ,हिंदी के जाने-माने नायक,खलनायक और चारित्रिक अभिनेता प्राण साहब की. प्राण का जिक्र आते ही आँखों के सामने एक ऐसा भावप्रवण चेहरा आ जाता है,जो अपने हर किरदार में जान डालते हुए यह अहसास करा जाता है,कि उसके बिना यह किरदार अर्थहीन है.उनकी संवाद अदायगी की  शैली को लोग आज भी नहीं भूले है.
इस हरफनमौला अभिनेता को दशको  तक बुरे आदमी {खलनायक}के तौर पर जाना जाता रहा और ऐसा हो भी क्यों ना,परदे पर उनकी विकरालता इतनी जीवंत थी,कि लोग उसे ही उनकी वास्तविक छवि मान बैठे.लेकिन फ़िल्मी परदे से इतर प्राण असल जिंदगी में वे बेहद सरल,ईमानदार,और दयालु व्यक्ति थे.समाज सेवा और सबसे  अच्छा व्यवहार करना उनका गुण था.
१२ फरवरी १९२० को प्राण का जन्म पुरानी दिल्ली को वल्लीमारन इलाके में बसे एक रईस परिवार में हुआ.प्राण का असली नाम 'प्राण कृष्ण सिकन्द'था.लेकिन फ़िल्मी दुनियां में वे प्राण नाम से प्रसिद्ध थे.इनकी पत्नी  का नाम 'शुक्ला सिकन्द'था.प्राण के दो पुत्र 'अरविन्द' और 'सुनील' तथा एक पुत्री पिंकी है.बचपन से पढाई में होशियार प्राण एक स्टिल फोटोग्राफर बनाना चाहते थे.लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था.बात वर्ष १९४० की है,एक दिन प्राण साहब पान की दुकान पर खड़े थे,तभी  पंजाबी फिल्मों के डाएरेक्टर मोहम्द वली की नजर उन पर पड़ी,तो उन्हें अपनी पंजाबी फिल्म 'यमला जट' में ले लिया.और फिल्म काफी हिट हो गयी.और यही से उदय हुआ बॉलीवुड के एक नायब सितारे का.इसके बाद प्राण ने 'चौधरी'और फिर 'खजांची'फिल्म में काम किया.फिर क्या था प्राण ने कभी दोबारा पीछे मुड़कर देखा ही नहीं और वर्ष १९४७ तक वह २० से ज्यादा फिल्मो में काम कर चुके थे.और एक हीरो वाली इमेज के साथ इंड्रस्ट्री में काम कर रहे थे.हाँलाकि लोग उन्हें विलेन के रूप में देखना ज्यादा पसंद करते थे. 
प्राण की शुरुवाती फिल्मे हो या बाद की कभी भी उन्होंने अपने आप को दोहराया नहीं,उन्होंने अपने हर किरदार को बड़े जीवंत ढंग से जिया,फिर चाहे वह भूमिका छोटी हो या बड़ी.वर्ष १९५६ आई फिल्म 'हलाकू' से उन्हें बड़ी सफलता मिली.जिसमें उन्होंने डकैत हलाकू का सशक्त किरदार निभाया था.तदुपरांत राजकपूर निर्मित 'जिस देश में गंगा बहती है'में दोबारा फिर से प्राण डाकू राका की भूमिका निभाई,जिसमें उन्होंने केवल अपनी आँखों से क्रूरता जाहिर कर दी,लेकिन वर्ष १९७३ में फिल्म 'जंजीर'में अमिताभ बच्चन के मित्र शेरखान के रूप में उन्होंने अपनी आखों से ही दोस्ती का भरपूर सन्देश दे दिया.इस फिल्म का गीत 'यारी है इमान मेरा  यार मेरी जिंदगी'सिर्फ और सिर्फ उनके नृत्य की वजह से याद किया जाता है.वर्ष १९७४ फिल्म 'मजबूर' का गीत 'फिर ये मत कहना माइकल दारू पी  के दंगा'आज भी युवाओ को नहीं भुला. वर्ष १९६७ में भारत कुमार यानि मनोज कुमार  द्वारा निर्मित  फिल्म 'उपकार'में वह एक अलग रूप मंगल  बाबा का रोल किया.जिसमें वह एक अपाहिज के रूप में नजर आये.भूमिका छोटी जरूर थी लेकिन उनको दमदार अभिनय के लिए उन्हें पुरुस्कृत भी किया गया.उन पर फिल्माया गया गीत 'कसमे वादे प्यार वफ़ा सब' आज भी लोगो के जेहन में बसा हुआ है.वर्ष १९७२ फिल्म 'विक्टोरिया नंबर २०३ ' में प्राण साहब अशोक कुमार के साथ कॉमेडी करते नजर आये.इस नयी भूमिका के लिए लोगो ने उन्हें खूब सराहा गया.
प्राण ने करीब ३५० फिल्मो में अलग-अलग अभिनय के रंग बिखेरे,जिसमे 'पत्थर के सनम','तुमसा नहीं देखा','बड़ी बहन','मुनीम जी','गंवार','गोपी','हमजोली',दस नम्बरी','अमर अकबर अन्थोनी','दोस्ताना' 'कर्ज','अंधा कानून','पाप की दुनियां','मृत्युदाता' आदि प्रमुख फिल्मे थी. अभिनय में रंग बिखेरने के अतरिक्त प्राण कई सामाजिक संगठनो से भी जुड़े है.और उनकी अपनी एक फ़ुटबाल टीम बॉम्बे डायनेमस  फ़ुटबाल क्लब भी है.
प्राण को अपने फ़िल्मी जीवन में तीन बार सर्वश्रेष्ट सहायक अभिनेता का फिल्म फेयर अवार्ड दिया गया.वर्ष १९९७ में उन्हें फिल्म फेयर लाइफ टाइम अचीवमेंट ख़िताब से नवाजा गया.हिंदी सिनेमा को योगदान के लिए २००१ में भारत सरकार के पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था.
प्रेमी,बदमाश,कामेडियन और इन सबके भीतर और परे सब कुछ प्राण हर किरदार में जान डाल देते थे,उसमें ढल जाते थे.उन्होंने कभी भी अभिनय का प्रशिक्षण नहीं लिया था,वह उस दौर के कलाकार है,जब अभिनय प्रशिक्षण केन्द्रों का देश में नामोनिशान नहीं था.लेकिन उन्हें अभिनय की चलती फिरती पाठशाला कहा जा सकता है.ये स्टाइलिस्ट शख्स हर भूमिका को अलग-अलग स्टाइल से अदा करने के लिए हमेशा याद किया  जायेगा.......

Thursday, 14 April 2011

राजेश खन्ना :सिर चढ़कर बोला जादू

 
    स्टाइल  के लिहाज से उनका जादू चलता है.वे आँख मारकर ही महिलाओं को बेहोश कर कर सकते थे.उस समय लड़कियां उन्हें अपने खून से खत भेजने लगी थी.जब भी उनकी कार निकलती,तो लड़कियां उनकी कार को किस कराती थी.युवा वर्ग तो उनका दीवाना था.उस दौर में वह हर हिरोइन के अकेले सुपरस्टार हीरो हुआ करते थे.उनके बोलने का अपना ही दिलकश अंदाज था.अपने रूमानी अंदाज,स्वाभाविक अभिनय और कामयाब फिल्मो के लंबे सिलसिले के बल पर उन्होंने करीब डेढ़ दशक तक हिंदी सिनेमा के रूपहले परदे पर राज किया.ये कोई और नही अपने काका थे यानि राजेश खन्ना.हिंदी सिने प्रेमियों को राजेश खन्ना के रूप में हिंदी सिनेमा का पहला सुपर स्टार मिला,जिनका जादू लोगो के सिर चढ़कर बोला.
राजेश खन्ना का जन्म २९ दिसम्बर सन् १९४२को पंजाब के अमृतसर शहर में हुआ था.राजेश खन्ना का असली नाम जतिन खन्ना है.वह उन कुछ चुनिन्दा सितारों में से है जिन्होंने  बॉलीवुड में पदार्पण किसी गाडफादर के जरिये नहीं किया बल्कि राष्ट्रीय स्टार पर आयोजित प्रतियोतिता जीतकर किया.परिवार की मर्जी के खिलाफ अभिनय को बतौर कैरियर को चुनने वाले राजेश खन्ना ने  वर्ष  १९६६ में अपने अभिनय की शुरुवात फिल्म 'आखिरी खत'से किया.उनको पहली सफलता तब मिली जब फिल्म 'बहारों के सपने'ने बॉक्स ऑफिस पर सफलता अर्जित की लेकिन अब भी वह फ़िल्मी जगत में संघर्ष कर रहे थे क्योकि बाद में उनकी कई फिल्मे बॉक्स ऑफिस पर असफल हो गयी.
वर्ष  १९६९ में आई फिल्म 'अराधना'ने राजेश खन्ना के कैरियर को नयी दिशा दी.फिल्म को अपार सफलता मिली.फिल्म में शर्मीला के साथ उनकी जोड़ी बहुत पसंद की गयी.बाद में उन्होंने शर्मीला के साथ 'सफर','बदनाम','फ़रिश्ते','छोटी बहू','अमर प्रेम','राजा रानी'और 'आविष्कार' की.ये फिल्मे भी बहुत कामयाब रही थी.जबकि 'दो रास्ते','बंधन','सच्चा झूठा',दुश्मन','अपना देश','आप की कसम','रोटी' और 'प्रेमकहानी'में मुमताज के साथ उनकी जोड़ी पसंद की गयी.उन्होंने जिन प्रमुख हेरोइन के साथ ज्यादा काम किया उनमें शर्मीला,मुमताज,हेमामालिनी,और आशा पारेख थी.फिल्म आराधना के बाद उन्होंने ४ साल लगातार 'दो रास्ते','ख़ामोशी','सच्चा झूठा'जैसी करीब १५ हिट फिल्मे देकर समकालीन तथा अगली पीढ़ी के अभिनेताओ के लिए मील का पत्थर कायम किया.वर्ष १९७१ में 'कटी पतंग','आन्नद','आन मिलो सजना','महबूब की मेहदीं','हाथी मेरे साथी'और 'अंदाज'जैसी सुपर हिट फिल्मे दी ,यह साल उनके कैरियर का सबसे यादगार साल रहा.जिससे वह हिंदी सिनेमा के पहले सुपर स्टार बनकर प्रशंसको के दिल पर छा गए.
वर्ष १९७० में फिल्म 'सच्चा झूठा' के लिए उन्हें पहली बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्म फेयर अवार्ड दिया गया.भाव पूर्ण दृश्यों में राजेश खन्ना के सटीक अभिनय को आज भी याद किया जाता है.वर्ष १९७१में 'आनंद' के लिए उन्हें दूसरी बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्म फेयर अवार्ड दिया गया.इस फिल्म में एक लाइलाज बीमारी से पीड़ित व्यक्ति के किरदार को उन्होंने एक जिंदादिल इंसान के रूप में जीकर कालजयी बना दिया.यह उनके अभिनय का शसक्त उदहारण है.साल २००५ में उन्हें फिल्म फेयर लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड दिया गया.
फ़िल्मी दुनियां के इस चमत्कारी नायक के स्टाइल के लिहाज से जादू चलता था.पहनावे के हिसाब से वे अपने ज़माने के प्रतीक  थे.उनके छोटे कुर्ते,चाइनीज कॉलर,दोहरी सिलाई वाली जैकेट,कमीज के साथ सपाट ट्राउजर और बेल्ट के असंख्य युवा दीवाने थे.
वर्ष १९७६ के बाद का समय राजेश खन्ना के लिए कुछ अच्छा नहीं रहा.उनकी ज्यादातर फिल्मे असफल होने लगी.इसके बाद वह बॉलीवुड में नजरअंदाज किये जाने लगे,क्योकि वह अकसर सूटिंग पर लेट पहुँचते थे और उनका रवैया बदल गया.कुछ समय बाद उनमें बदलाव आया और उन्होंने कुछ सामाजिक फिल्मे की.
राजेश खन्ना,आर.डी.बर्मन और किशोर कुमार तीनों ने मिलकर काफी सफल फिल्मे दी.इन तीनों गहरे दोस्तों ने करीब ३० फिल्मो में साथ-साथ काम किया.उस समय किशोर के स्वर से राजेश खन्ना पहचाने जाने लगे थे.कुछ और कलाकार जिन्होंने राजेश खन्ना के साथ एक टीम के रूप में कई फिल्मो में काम किया,उसमें प्रमुख सुजीत कुमार,प्रेम चोपड़ा,मदन पुरी,असरानी,बिंदु,विजय अरोड़ा और ए.के.हंगल आदि प्रमुख थे.
६०  के दशक में अंजू महेंदू के साथ उनके रोमांस के खूब चर्चे हुए.लेकिन ७० का दशक आते-आते दोनों में अलगाव हो गया और वर्ष १९७३ में राजेश खन्ना ने खुद से उम्र में काफी छोटी नवोदित अभिनेत्री डिम्पल कपाडिया से शादी कर ली.डिम्पल से उनको दो बेटियां ट्विंकल खन्ना और रिंकी खन्ना हुई.लेकिन १९८४ में दोनों अलग हो गए.और वह कुछ समय के लिए टीना मुनीम के भी प्यार में रहे.लेकिन बाद में फिर उनके और डिम्पल के बीच प्यार जागा और दोनों साथ रहने लगे.
८० के दशक के बाद फिल्मो से ब्रेक लेकर उन्होंने राजनीति की ओर कदम रखा और १९९१ से १९९६ के बीच नई दिल्ली से कॉग्रेस के लोक सभा सांसद भी रहे.लेकिन अभिनय और राजनीति में अपना भाग्य अजमा चुके राजेश खन्ना का ज्यादा मन अभिनय में ही लगा और वह फिर से फिल्मो और टी.वी.पर लौट आये तथा टी.वी. के कई सीरियल में भी दिखाई पड़े.
वर्ष १९९४ में उन्होंने फिल्म 'खुदाई'से अभिनय की दूसरी पारी की शुरुवात की.उसके बाद उन्होंने 'आ अब लौट चले','क्या दिल ने कहा','वफा','जाना','काश मेरे होते','दो दिलो के खेल में'आदि फिल्मो में काम किया.लेकिन उन्हें वह सफलता दोबारा  नहीं मिल पाई.फिर भी आज उनका फ़िल्मी सफर जारी है.आज भी उनकी खास अदाएं बॉलीवुड के इतिहास का ऐसा अध्याय है,जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती....

 

Wednesday, 13 April 2011

ऋषिकपूर:असली वैलेंटाइन

   साल १९७० फिल्म मेरा नाम जोकर हिंदी सिनेमा के रुपहले परदे पर एक कच्चा,गोल-मटोल लड़का दिखाई पड़ा.यही से हिंदी सिनेमा में एक नये सितारे का उदय हुआ.यह सितारा था चिंटू यानि ऋषिकपूर. ऋषिकपूर का जन्म सन १९५२ में जाने-माने अभिनेता और निर्माता-निर्देशक राजकपूर के दूसरे बेटे के रूप में हुआ.उनके घर-परिवार वाले उन्हें प्यार से चिंटू कहते थे. घर में फिल्मो का माहौल होने के कारण ऋषिकपूर का रुझान फिल्मो की तरफ हो गया.पहले पहल पिता राजकपूर ने अपनी सबसे महत्त्वाकांक्षी फिल्म 'मेरा नाम जोकर' में उन्हें पेश किया.इस फिल्म में उन्होंने १४ वर्ष के लड़के की भूमिका निभाई,जो अपनी शिक्षिका से ही प्रेम करने लगता है.इस छोटे लड़के ने अपने अभिनय से लोगो के दिल में जगह बना ली.अपसोस,यह फिल्म बाक्स ऑफिस पर पिट गयी.लेकिन ऋषिकपूर को अपने दमदार अभिनय के लिए उन्हें उस साल का सर्वश्रेष्ठ बाल कलाकार का राष्ट्रीय पुरूस्कार मिला.
साल १९७३ एक दुबला-पतला,चुस्त-दुरुस्त हीरो राजकपूर निर्मित फिल्म 'बाँबी' में दिखाई पड़ा.लोग हैरान रह गए क्योकि यह कोई और नहीं यह ऋषिकपूर थे.फिल्म की नायिका डिम्पल कपाडिया थी.फिल्म टीन एजर्स को घ्यान में रखकर बनायीं गयी थी.इस फिल्म ने सफलता के नये रिकार्ड बनाये और साल की जबरदस्त हिट फिल्म थी.साथ ही ऋषिकपूर अपने चाकलेटी चेहरे और बाँबी वाले रोमांटिक रोल की बदौलत उन्होंने प्रसंशको का एक वर्ग खड़ा कर लिया.   
साल १९७५ बाँबी के बाद फिल्म खेल खेल में ऋषिकपूर के खाते में एक और बड़ी सफलता दर्ज करा दी.फिल्म खेल खेल में उनकी नायिका नीतू सिंह थी.जो बाद में उनके रियल लाइफ की भी नायिका बनी.नीतू सिंह के साथ उनकी जोड़ी हिट 
हुई,उन्होंने रफूचक्कर,जहरीला इंसान,जिंदादिल,कभी-कभी,अमर अकबर एंथोनी,अनजाने,दुनिया मेरी जेब में,झूठा कही का,धनदौलत,दूसरा आदमी,साथ-साथ की.
 वास्तव में ऋषिकपूर उस दौर में अकेले चाकलेटी और रोमांटिक हीरो थे.जहाँ तक उनके अभिनय की बात की जाय,तो ऋषिकपूर अपने भाइयों पर ही नहीं अपने पिता और चाचाओ पर भी भरी पड़ते थे.उस दौर में जब अमिताभ बच्चन,संजीव कुमार,और विनोद खन्ना जैसे मंझे कलाकारों की मौजूदगी में भी ऋषिकपूर ने दमदार अभिनय से दर्शको को दीवाना बना लिया और अपने दम पर लगातार हिट फिल्मे दी.
८० के दशक में 'सरगम' और 'कर्ज' जैसी हिट फिल्में देने के बाद एक बार फिर अपने पिता के निर्देशन में फिल्म 'प्रेमरोग' में नजर आये.नायिका प्रधान फिल्म होने के बावजूद ऋषिकपूर सब पर छाये रहे.इसके बाद ऋषिकपूर ने 'नगीना','चांदनी','हिना','बोल राधा बोल','दामिनी',आदि से होते हुए ९० के दशक तक हीरो की पारी खेलते रहे.फिल्म 'बाँबी' से शुरू हुआ एक रंगीला सफर शोख टी-शर्ट,चुस्त कमीज,एक रंग सूट,गोल टोपी और बड़ा चश्मा जो बाद के दिनों में बहुरंगी पुलओवर और सफ़ेद पैंटो के बिना अधूरा माना जाता है.
आज नयी सदी के दशक में ऋषिकपूर पिता तथा चारित्रिक भूमिकाओ में नजर आ रहे है.'हम-तुम','फना','नमस्ते-लन्दन','लक बाय चांस','लव आज कल',आदि फिल्मो में भी उनका अभिनय दमदार था. ऋषि अपने चार दशक लंबे फ़िल्मी कैरियर में लगभग १२५ फिल्मो में काम किया.हाल ही में आई फिल्म 'पटियाला हॉउस' में ऋषिकपूर अक्षय के पापा की भूमिका में नजर आये.कभी रोमांटिक और चाकलेटी हीरो कहे जाने वाले आज बुजुर्ग और चारित्रिक भूमिकाओ में भी अपनी शसक्त उपस्थिति दर्ज करा रहे है.इसलिए सही कहा जाता है-ओल्ड इज गोल्ड.......



Tuesday, 12 April 2011

विनोद खन्ना:मर्दानगी की मिसाल

चौड़ी कद-काठी वाले विनोद खन्ना की अदाकारी तो दर्शकों को आज तक याद है.उस दौर में जब सुपर स्टार अमिताभ बच्चन का क्रेज और जीतेन्द्र का जलवा लोगो के सिर चढ़कर बोल रहा था,तब विनोद खन्ना ही एक ऐसे कलाकर थे,जो उनके सबसे निकटतम प्रतिद्वंव्दी थे.उन्होंने अपना फ़िल्मी सफर सुनील दत्त द्वारा 1968 में निर्मित फिल्म 'मन का मीत'से शुरू किया.उसमें उन्होंने विलेन का रोल किया था लेकिन यही विलेन आगे चलकर बड़े-बड़े हीरो पर भारी पड़ने लगा.
फिल्म 'अमर अकबर एंथोनी'का दृश्य आज भी लोगो के जेहन में है,जिसमे वह अमिताभ बच्चन को उन्ही के इलाके में जाकर लड़ाई के लिए ललकारते है.धर्मेन्द्र के बाद अगर किसी हीरो ने लड़कियों पर अपनी मैचो मैन की छवि बनायीं,तो वे थे विनोद खन्ना.फिल्म कुर्बान{1986}में उन्होंने टी शर्ट और चुस्त जींस पहनी.नीचे फैली हुई पैंट,सीना दिखने वाली कमीज ने उन्हें पुरुषत्व का प्रतीक बना दिया,जिससे लोग उनके दीवाने हो गए.
अमिताभ बच्चन के साथ उन्होंने 'परवरिश','हेरा-फेरी',और 'अमर अकबर एंथोनी'जैसी फिल्में की लेकिन अभिनय से लेकर पर्सनालिटी तक कहीं भी वह अमिताभ से उन्नीस साबित नहीं हुए.विनोद खन्ना जब अपने फ़िल्मी कैरियर के चरम पर थे,तब उन्होंने फ़िल्मी दुनियां से विदाई ले ली और ओशो की शरण में चले गए.आठ वर्ष के बाद वह एक बार फिर फ़िल्मी दुनिया में लौटे तथा फिर से खुद को साबित किया.खलनायक और फिर अभिनेता से लेकर राजनेता तक,रील लाइफ से लेकर रियल लाइफ में विनोद खन्ना ने हर तरह के किरदार का स्वाद चखा.
शुरुवात  में उन्होंने बतौर खलनायक कई फिल्में साइन की,जिसमें 'मेरा गाँव मेरा देश','पत्थर और पायल','आन मिलो सजना' तथा 'अनोखी अदा' आदि प्रमुख थी.सर्वप्रथम गुलजार ने उन्हें अपनी फिल्म 'मेरे अपने'में बतौर हीरो लिया.उसमें उनकी हिरोइन मीना कुमारी थी.इस फिल्म के बाद विनोद खन्ना ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और उनके फ़िल्मी कैरियर को नयी दिशा मिली.विनोद खन्ना इससे पहले 'रेशमा शेरा','पूरब और पश्चिम',  'सच्चा-झूठा' में छिटपुट रोल कर चुके थे.विनोद खन्ना ने अपने अभिनय  से युवा दिलों पर खूब राज किया और उनके अभिनय की उड़ान आज भी जारी है.फिल्म 'दबंग' में वह सलमान के पापा की भूमिका में नजर आये.विनोद खन्ना हिंदी फिल्मों के लीजेंड में से एक है...

Monday, 11 April 2011

दो शब्द

इस नये ब्लॉग में आप सभी सुधी पाठकों का स्वागत है.ये मेरा नया ब्लॉग  सिने जगत की कुछ  महान हस्तियों की भुली-बिसरी यांदों को आप सभी तक पहुचना है.अगर आप लोगो का साथ व आशीर्वाद  रहा,तो यह काम पूरी लगन व ईमानदरी से करता रहूगां.मै अपने सभी पाठकों से बेबाक टिप्पणी और मशविरा देने  का विनम्र आग्रह करता हूँ,ताकि विचारों की प्रवाहमान नदी के बहाव का सही अंदाजा लगाया जा सके.         
                                                                                            
                                                                                                      
                                                                                                                                        --पुष्कर सिंह