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Tuesday, 26 July 2011

अमजद खान : बॉलीवुड के गब्बर सिंह

    यूँतो बॉलीवुड में समय-समय कई अभिनेताओ ने डाकुओ के पात्र में अभिनय किया है और वाहवाही बटोरी है.लेकिन सन 1975 में प्रदर्शित फिल्म "शोले"के पात्र डाकू गब्बर सिंह पूरे देश में तब से लेकर आज तक लोकप्रिय है.और बोलने,चलने-फिरने,हँसने और खैनी फांकने की अदा आज 38 साल बाद भी हम सभी के दिलो दिमाग में बसी है.और समय-समय पर कई अभिनेताओ ने लोकप्रियता पाने के लिए इस पात्र की अदा की नक़ल भी की. डाकू गब्बर सिंह पात्र को परदे पर जीवंत बनाने वाले चमत्कारिक अभिनेता थे-अमजद खान.अमजद खान भले ही आज इस दुनियां में नहीं है,लेकिन डाकू गब्बर सिंह आज भी फ़िल्मी परदे पर जिन्दा है. 
इस  चमत्कारिक अभिनेता का जन्म 12 नवम्बर 1940 को फिल्मों के जाने माने अभिनेता जिक्रिया खान के पठानी परिवार में आन्ध्रप्रदेश के हैदराबाद शहर में हुआ था.इनके पिता बॉलीवुड में जयंत के नाम से काम करते थे.बचपन से ही अमजद खान को अभिनय से लगाव हो गया और थियटर से जुड़ गए.अमजद खान की पहली फिल्म बतौर बाल कलाकार "अब दिल्ली दूर नहीं"{1957},थी,जब वह केवल 17 साल के थे.
अमजद खान पढाई पूरी करने के बाद निर्देशक के.आसिफ के साथ असिस्टेंट के रूप में काम करने लगे.बतौर कलाकार अमजद खान की पहली फिल्म "मुहब्बत और खुदा"थी,जिसमें वह अभिनेता संजीव कुमार के गुलाम की भूमिका की थी.इस बारे में बहुत कम लोग जानते है कि बतौर अभिनेता उनकी पहली फिल्म "शोले"नहीं थी.
गांधी के इस देश में गब्बर सिंह की लोकप्रियता अबूझ पहेली है.फिल्म "शोले"एक बहुत बड़ी फिल्म थी.जब निर्देशक रमेश सिप्पी ने अमजद खान जैसे नये अभिनेता को फिल्म के लिए चुना तो उनके साथियों ने कहा अमजद खान जैसा नया लड़का अमिताभ,धर्मेन्द्र और संजीव कुमार जैसे धुरंधर अभिनेताओ के सामने टिक नहीं पायेगा.हांलाकि पहले इस भूमिका के लिए निर्देशक रमेश सिप्पी डैनी डेन्जोप्पा को लेना चाहते थे.लेकिन वह फिरोज खान की फिल्म "धर्मात्मा"में व्यस्त थे.सलीम और जावेद इस नये कलाकार अमजद खान  को अवसर देने के लिए निर्देशक रमेश सिप्पी से आग्रह किया,जिसे इन्होनें एक नाटक में अभिनय करते देखा था.विलक्षण कलाकारों की मौजूदगी के बावजूद अमजद खान अभिनीत डाकू गब्बर सिंह सर्वाधिक लोक प्रिय पात्र फिल्म इतिहास में किंवदंती बन चुका है.
अपने 16 साल के फ़िल्मी कैरियर में अमजद खान ने लगभग 120 फिल्मो में काम किया.उनकी प्रमुख फिल्मे "आखिरी गोली","हम किसी से कम नही","चक्कर पे चक्कर","लावारिस","गंगा की सौगंध","बेसर्म","अपना खून","देश परदेश","कसमे वादे","क़ानून की पुकार","मुक्कद्दर का सिकंदर","राम कसम","सरकारी मेहमान","आत्माराम","दो शिकारी", "सुहाग","द ग्रेट गैम्बलर","इंकार","यारी दुश्मनी","बरसात की एक रात", "खून का रिश्ता","जीवा","हिम्मतवाला","सरदार","उत्सव" आदि है. जिसमे उन्होंने शानदार अभिनय किया.अमजद जी अपने काम के प्रति बेहद गम्भीर व ईमानदार थे.परदे पर वे जितने खूंखार और खतरनाक इंसानों के पात्र निभाते थे.लेकिन वे वास्तविक जीवन और निजी जीवन में वे एक भले हँसने हँसाने और कोमल दिल वाले इंसान थे.
फिल्म "शोले" की सफलता के बाद अमजद खान ने बहुत सी हिंदी फिल्मो में खलनायक की भूमिका की.70 से 80 और फिर 90 के दशक में उनकी लोकप्रियता बरक़रार रही.उन्होंने डाकू के अलावा अपराधियों के आका,चोरों के सरदार और हत्यारों के पात्र निभाए.उनकी ज्यादातर फिल्मों में अमिताभ ने हीरो की भूमिका निभाई है.बॉलीवुड में अमिताभ,अमजद और कादर खान तीनों की दोस्ती मशहूर थी.उन्होंने फिल्म "याराना" में अमिताभ के दोस्त और फिल्म "लावारिस"में पिता की भूमिका की थी.उन्होंने कुछ हास्य किरदार भी निभाए जिसमे फिल्म "कुर्बानी",लव स्टोरी" और "चमेली की शादी" में उनके कॉमिक रोल को खूब पसंद किया गया.80 के दशक में उन्होंने दो फिल्मे बनायीं थी.सन 1983 में "चोर पुलिस" जो कि सफल रही और 1985 में "अमीर आदमी गरीब आदमी"जो की बॉक्स ऑफिस पर फेल हो गयी थी.
अमजद खान जी ने सन 1972 में शैला खान से शादी कर ली थी.और कुछ वर्षों बाद उनके घर एक पुत्र हुआ शादाब खान जिन्होंने कुछ फिल्मे भी की.उनके एक पुत्री अहलाम खान और दूसरे पुत्र सीमाब खान है जो कि फिल्मों में नहीं आये.
कहते  है पात्र लेखक की कठुतालियाँ होते है.और भगवान की कठपुतली इंसान है.जिसका समय पूरा होता है.उसी की डोर खीच ली जाती है.गोवा जाते समय दुर्घटना के बाद अमजद जी का बच जाना किसी खुदा के करिश्में से कम न था.अमिताभ बच्चन ने उस संकट की घड़ी में अपना खून दिया और घंटो अस्पताल में प्रार्थना करते रहे.अमजद जी चंगे हुए,लेकिन वह मानसिक रूप से थोड़ा कमजोर हो गए.किन्तु इसी बीच उनके पिता का भी देहांत हो गया.जिससे परिवार का सारा बोझ उन्ही के कंधो पर आ गया,साथ ही वह कारटीजोन नामक बीमारी के प्रभाव में आकार मोटे हो गए.जिससे वह दिन भर में केवल शुद्ध दूध और शक्कर की सौ प्याली चाय की आदत हो गयी.इससे वजन बढ़ता गया और बेचरा दिल कब तक,कहाँ तक दम मारता और अंततः 27 जुलाई 1992 को भारतीय फिल्म का यह सितारा ह्रदय गति रुकने से सदा के लिए अस्त हो गया.लेकिन जब भी हिंदी फिल्मों के विलेन की चर्चा होगी तो गब्बर सिंह यानि अमजद खान जी के नाम सबसे पहले लिया जायेगा..............
 






Saturday, 23 July 2011

मुकेश : ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना....

  वेमोहम्द रफ़ी,मन्ना डे और किशोर कुमार जैसे महान गायकों के समकालीन थे.तथा 60 से 70 दशक की हिंदी फिल्मों में अपनी आवाज के जरिये छाये रहे.वे अभिनेता राजकपूर की आवाज बन गए थे.इन्होनें अभिनेता राजकपूर अभिनित अधिकतर फिल्मों में राजकपूर के लिए अपनी आवाज दी.इनके निधन पर राजकपूर जी ने स्वयं कहा था आज मैंने अपनी आवाज खो दी है.हाँ आज हम बात करने वाले है.हिंदी फिल्मों के महान गायक  मुकेश जी की.हिंदी फिल्म जगत में मुकेश जी अपनी अलग तरह की आवाज के लिए हमेशा याद किये जायेगें.उनकें गीत आज भी लोगो को सुकून देते है.उनकी आवाज उनके देहांत के करीब 36 साल बाद भी श्रोताओं के दिल में बसी है.
मुकेश जी का पूरा नाम मुकेश चन्द्र माथुर था.वह 22 जुलाई 1923 को एक मध्यम वर्गीय परिवार में जन्में थे.उन्हें अभिनय और गायन का बचपन से ही शौक था और वे गायक के.एल.सहगल के प्रशंसक थे.मात्र दसवीं तक पढने के बावजूद उन्हें लोक निर्माण कार्य में सहायक सर्वेक्षण विभाग में नौकरी मिल गयी.जहाँ पर उन्होंने केवल सात महीने तक काम किया.पर शायद किस्मत को कुछ और मंजूर था.दिल्ली में उन्होंने चुपके से कई गैर  फ़िल्मी गानों की रिर्काडिंग करी.इसी गायकी और अभिनय के शौक ने उन्हें दिल्ली छोड़कर मुंबई आने पर विवश कर दिया और वे फिल्म स्टार बनने के लिए नौकरी छोड़कर मुंबई आ गए.और वे अपने रिश्तेदार व प्रसिद्ध कलाकार मोतीलाल के यहाँ ठहरने लगे.
मुकेश ने यूं तो अपने कैरियर की शुरुवात 1941 में फिल्म 'निर्दोष' में अभिनेता-गायक के तौर पर की,लेकिन पार्श्वगायक के तौर पर उन्हें अपना पहला काम साल 1945 में फिल्म 'पहली नजर' में मिला.इसके संगीतकार अनिल विश्वास जी थे{इनके बारे में फिर कभी बात होगी}.हिंदी फिल्म में जो पहला गाना मुकेश जी गाया था वह था "दिल जलाता है तो जलने दो...."जिसमे अदाकारी मोतीलाल जी ने की थी.इस गीत में मुकेश जी के आदर्श गायक के.एल.सहगल का प्रभाव साफ दिखा.इसी गीत के बाद उनका पहला युगल गीत फिल्म 'उस पार' में गायिका कुसुम के साथ "ज़रा बोली री हो...."था.फिर उन्होंने फिल्म 'मूर्ति'में "बदरिया बरस गयी उस पार....."खुर्शीद के साथ गाया.उस समय तक उन्होंने सुनने वालो के मन में अपनी जगह बना ली थी.इसके बाद उन्होंने फिल्म 'आग' 'अनोखी अदा' और 'मेला' में लोगो ने सुना और उनकी आवाज के जादू से देश के सभी श्रोता मंत्रमुग्ध हो गए.
 साल 1949 में उन्होंने एक और मील का पत्थर पार किया वो था उनका ,महान अभिनेता राजकपूर और महान संगीत कार शंकर जयकिशन का मिलना.राजकपूर जी उनसे और शंकर जयकिशन जी से अपने आर.के.फिल्म्स के लिए गानों की फरमाईश करते रहते थे.उसके बाद तो 'आवारा' और 'श्री 420'जैसी फिल्मो में गए गए गाने "आवारा हूँ......" व "मेरा जूता है जापानी ......." से  उनकी    आवाज देश ही नहीं विदेश में भी शोहरत पायी.रूस में तो "आवारा हूँ ....."सड़को पर सुनाई देने लगा था.'आह''आवारा''बरसात''श्री 420''अनाड़ी''जिस देश में गंगा बहती है'संगम''मेरा नाम जोकर' व कुछ अन्य राजकपूर जी फिल्मों में मुकेश जी द्वारा गाये गए गाने आज भी तरो-ताजा लगते है.
अब थोड़ी बात मुकेश जी के गृहस्थ जीवन की जाय.मुकेश जी ने सरल जी से साल 1946 में शादी कर ली थी.मुकेश जी के एक बेटा और दो बेटियां है जिनके नाम-नितिन मुकेश,रीटा और नलिनी.जिसमे नितिन मुकेश ने अपने पिता मुकेश के तरह गायकी में हाथ आजमाया और लोगो ने काफी पसंद किया.
साल 1976 में अगस्त महीने के अंतिम सप्ताह में मुकेश जी एक कार्यक्रम के सिलसिले में अमेरिका के मिशिगन गए.वही उनका 27 अगस्त 1976 को दिल का दौरा पड़ने से देहांत हो गया.उनकी मृत्यु के पश्चात भी उनके द्वारा गाये गये गानों से सजी कई फिल्मे रिलीज हुई ये फ़िल्में 'धरमवीर''सत्यम शिवम सुन्दरम''अमर अकबर एंथोनी''खेल खिलाडी का''दरिंदा' प्रमुख थी.लोगो ने इनके गीतों में मुकेश की आवाज को खूब पसंद किया.मुकेश के द्वारा गाई गई 'तुलसी रामायण'आज भी लोगो के भक्ति भाव से झूमने को मजबूर कर देती है.करीब 200 से अधिक फिल्मों में आवाज देने वाले मुकेश ने संगीत की दुनियां में अपने आपको को दर्द का बादशाह तो साबित किया ही इसके साथ-साथ वैश्विक गायक के रूप में अपनी पहचान बनाई.फिल्म फेयर पुरूस्कार पाने वाले वह पहले पुरूष गायक थे.
केवल 56 साल की उम्र में इस दुनियां से अलविदा कहने वाले इस महान गायक की आवाज सुनकर दुनियां वाले शायद यही कहेगें.........."मै न भूलूँगा..."







 

Thursday, 14 July 2011

मदन मोहन : मेरा साया साथ होगा...

स्वर साम्राज्ञी लता जी उनके संगीत की कायल थी और उन्हें संगीत का शहजादा कहा करती थी,महान संगीतकार यस.डी.बर्मन ने भी कहा था कि उन जैसा संगीतकार दुनिया में मिलना मुश्किल है,उनके एक गीत 'आपकी नजरो ने समझा प्यार के काबिल मुझे ......' के संगीत से मशहूर संगीतकार नौशाद इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने इस धुन के बदले उन्हें अपनी सारी धुनें देने की ख्वाहिश जाहिर की थी.हाँ अपने बिलकुल ठीक समझा आज मै बात करने वाला हूँ महान संगीतकार मदन मोहन जी की....आज भी उनकी कशिश भरी आवाज और उतना ही उम्दा संगीत रूह में समा जाने वाला है.लोग उनके संगीत के दीवाने थे.                                                             सन 1950 से 1970 तक के तीन दशको में संगीत की धूम मचाने वाले इस महान संगीतकार का पूरा नाम मदन मोहन कोहली था.मदन मोहन जी का जन्म 25 जून 1924 को बग़दाद,इराक में हुआ था.जहाँ इनके पिता राय बहादुर चुन्नीलाल इराकी पुलिस के साथ एक एकाउंटेंट जनरल के रूप में काम करते थे.मध्य पूर्व में जन्मे मदन मोहन जी ने अपने जीवन के पहले पाँच साल यही पर बिताए.भारत आने के बाद पिता राय बहादुर चुन्नीलाल फिल्म व्यवसाय से जुड़ गए. तथा बाम्बे टाकीज और फिल्मिस्तान जैसे बड़े स्टूडियो में साझीदार बन गए.घर में फिल्मी माहौल होने के कारण मदन मोहन भी फिल्मो में काम करके बड़ा नाम कमाना चाहते थे,लेकिन पिता के कहने पर उन्होंने सेना में भर्ती होने का फैसला ले लिया और देहरादून में सेना की नौकरी शुरू कर दी.कुछ दिनों बाद उनका तबादला दिल्ली हो गया.लेकिन कुछ दिनों बाद उनका मन नौकरी में न लगा,उनका मन संगीत की तरफ खिच रहा था.इसलिए नौकरी छोड़ कर लखनऊ आ गए और लखनऊ आकाशवाणी में नौकरी कर ली.आकाशवाणी में उनकी मुलाकात संगीत जगत से जुड़े उस्ताद फैयाज खां,उस्ताद अली अकबर बेगम और तलत महमूद जैसी जानीमानी हस्तियों से हुई.जिससे इनका मन पूर्ण रूप से संगीत की ओर हो गया.और वह अपने को नया रूप देने के लिए लखनऊ से बम्बई {अब मुंबई}आ गए.
और  सबसे पहले उन्हें ख्याति प्राप्ति संगीतकारों सी.रामचंद्र और यस.डी.बर्मन के सहायक के रूप में काम करने का मौका मिला.इसके बाद उन्हें पहली बार सन 1950 में देवेन्द्र गोयल द्वारा निर्देशित फिल्म 'आखें' के लिए बतौर संगीतकार अपनी धुनें दी.फिल्म 'आखें'के बाद स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर मदन मोहन की चहेती पाश्र्व गायिका बन गयी.और वह अपनी हर फिल्म के लिए लता जी से ही गाने की गुजारिश किया करते थे.लता जी भी उनके संगीत निर्देशन से काफी प्रभावित थी और आपकी नजरों ने समझा .....,मेरा साया साथ होगा.....,नैना  ओ  बरसे  नैनो  में  बदरा  छाय.....,माई री मै कासे कहूँ ...,अगर मुझसे मोहबब्त है खेलो न मेरे दिल से ....,लग जा गले न तुम वेवफा हो......,वो भूली दास्ताँ ....सहित लगभग 210 गाने मदन मोहन जी की धुन पर गाये.और मदन मोहन जी के पसंदीदा गीतकार के तौर पर राजा मेहंदी अली खान,राजेंद्र कृष्ण और कैफी आजमी का नाम सबसे पहले आता है.लता जी ने गीतकार राजेंद्र किशन के लिए मदन मोहन जी की धुन पर कई गीत गए है.जिसमें यू हसरतो के दाग.......'अदालत'{1958},सपने में सजन दो बातें .....'गेटवे ऑफ इंडिया'{1957},मैंने तो तुम संग नैन .......'मनमौजी',भूली वो दास्तां......'संयोग'{1961},जैसे सुपरहिट गीत उन तीनों फनकारो की तिगड़ी बेमिसाल है.फिल्म 'हंसते जख्म' का गीत आज सोचा तो आँसू भर आये......गाते वक्त लता जी रो पड़ी थी.मदन मोहन जी के संगीत निर्देशन में आशा भोसले ने फिल्म 'मेरा साया'के लिए झुमका गिरा रे बरेली के बाजार में ....गाना गया जिसको सुनकर श्रोता आज भी झूम उठते है                                                                                                    वर्ष1970 में प्रदर्शित फिल्म 'दस्तक'के लिए मदन मोहन जी को सर्वश्रेष्ठ संगीत का पुरस्कार देकर सम्मानित किया गया.तीन दशक लंबे अपने फ़िल्मी कैरियर में उन्होंने लगभग 100 फिल्मों के लिए संगीत दिया.सुपर हिट संगीत देने वाले मदन मोहन जी ने अपने जीवन में कई उतार-चढाव देखे.यह एक दुर्भाग्य था कि उन्होंने जिन फिल्मों में संगीत दिया,उनमें से अधिकतर बॉक्स ऑफिस पर टिक न सकी लेकिन उनका संगीत हर व्यक्ति को सम्मोहित कर लेता था.फ़िल्मी दुनिया के स्वार्थ व धोखेबाजी से उन्हें कई बार काफी नुकसान हो गया.जिसके कारण वह शराब के आदी हो गए.अंततः मधुर संगीत लहरियों से श्रोताओ के दिल में खास जगह बना लेने वाले मदन मोहन जी 14 जुलाई 1975 को इस दुनिया से जुदा हो गए.उनकी मौत के बाद उनके संगीत निर्देशन में बनी फिल्म 'मौसम'और 'लैला मजनूं'रिलीज हुई,जिसके संगीत का जादू आज भी श्रोताओ को मंत्रमुग्ध कर देता है.वर्ष 2004 में यश चोपड़ा की फिल्म 'वीर जारा'में मदन मोहन जी की उन धुनों को लिया गया,जिन्हें वे अपने जीते जी नहीं कर सके......संगीतकार के अलावा वे एक अच्छे गायक भी थे.आज भले ही यह महान संगीतकार हम सभी के बीच नहीं है,लेकिन यह संगीत का सितारा सदा ही अपनी धुनों के लिए हम सभी के दिलो में चमकता रहेगा.............   

                                                       
                                                                                                

Monday, 11 July 2011

गुरुदत्त :दर्द की दास्तान

वेहमेशा उदासी और दर्द की गलियों में ही नहीं भटकते रहे.फिल्म 'मिस्टर और मिसेज 55'{1955}के शरारती कार्टूनिस्ट बने और फिल्म 'आर-पार'{1954}बेफिक्र टैक्सी ड्राइवर भी,लेकिन 'प्यासा'{1957} और 'कागज के फूल'{1959}की उदासी ही सिनेमा की दुनियां में हमेशा याद की जायेगी.वे एक बेमिसाल फिल्मकार थे.हाँ,आज हम बात कर रहे है गुरुदत्त साहब की,जो एक ऐसे इंसान थे,जो कभी भी अपनी कामयाबी पर इतराते नहीं थे और न ही नाकामयाबी से घबराते थे.उन्होंने सबसे अलग हटकर फिल्में बनायीं.दक्षिण एशिया में जो एक साफ़ सुथरा,लोकप्रिय और मनोरंजक सिनेमा 1950 के दशक में उभरा उसमें गुरुदत्त का केन्द्रीय योगदान था.वह बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे.उनकी फिल्मों को स्रजनात्मकता और कलात्मकता के लिए हमेशा याद रखा जायेगा.
गुरुदत्त साहब  का जन्म 9 जुलाई  1925 को   कर्नाटक  के                          कनारा    जिले में हुआ  था .उनका पूरा नाम वसंत कुमार शिवशंकर रावपादुकोण था.इनके पिता का नाम शिवशंकर राव पादुकोण जो कि पेशे से अध्यापक थे जिन्होंने बाद में बैंक की  नौकरी कर ली थी.और इनकी माता का नाम वैसांथी पादुकोण था.गुरुदत्त को बचपन से ही आर्थिक दिक्कतों का सामना करना पड़ा,जिससे इनकी शिक्षा प्रभावित हो गयी.और एक बच्चे के रूप में इनका अनुभव बहुत ही बुरा रहा.अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद गुरुदत्त ने अल्मोड़ा स्थित उदय शंकर नृत्य अकादमी में नृत्य का प्रशिक्षण लिया और कलकत्ता चले गए. वहाँ पर उन्होंने एक टेलीफोन ऑपरेटर की नौकरी कर ली.लेकिन कुछ समय बाद उनका मन नौकरी से उब गया और वह नौकरी छोड़कर बम्बई{अब मुंबई}वापस अपने माता-पिता के पास आ गए. 
साल  1944 में अपने चाचा की मदद से पुणे चले गए और प्रभात स्टूडियो से जुड गए ,जहाँ पर उन्होंने पहले अभिनेता और फिर नृत्य निर्देशक के रूप में अपना काम शुरू किया.यही उनकी मुलाकात कई हिंदी सिनेमा की फ़िल्मी हस्तियों के साथ हुई. और यही से वह पहली बार देवानंद जी के सम्पर्क में आये.इसके कुछ दिन बाद वह पुणे से बम्बई वापस लौट आये.और फिल्म निर्माण और अभिनय की शुरुवात की.मित्र देवानंद की संस्था नवकेतन के दूसरी फिल्म 'बाजी'{1951}का सम्पूर्ण निर्देशन दुरुदत्त जी सौप दिया गया.इस फिल्म में देवानंद मुख्य भूमिका में थे और हिरोइन थी पाश्र्वगायिका गीता राय,जिन्होंने बाद में गुरुदत्त जी से शादी करके गीतादत्त हो गयी थी.यह फिल्म बहुत ही कामयाब रही.इसके बाद गुरुदत्त देवानंद को लेकर एक और फिल्म बनाई 'जाल'{1952}जिसमें उनके साथ जानीवाकर साहब भी थे.जो आज तक के सभी हास्य अभिनेताओ में साफ-सुथरे अभिनेता के रूप में स्वीकृत हुए है.इसके बाद साल 1953 में बनी फिल्म 'बाज'बॉक्स ऑफिस पर ओंधे मुह गिर गयी,जिसका गुरुदत्त साहब को बहुत अफ़सोस हुआ.
इसके  बाद गुरुदत्त जी ने कई हिट बनाई,इसमें से 'आर-पार'{1954},'सी.आई.डी.'{1956},और 'मिस्टर और मिसेज 55'{1955}का संगीत भी जबरदस्त हिट हुआ.लोग आज भी पसंद करते है.बहुमुखी प्रतिभा के धनी गुरुदत्त साहब का अंतिम लक्ष्य कई बड़ी हिट फिल्में बनना था.और उन्होंने 'प्यासा'{1957},'कागज के फूल'{1959},'चौदवीं का चाँद'{1960},'साहब बीबी और गुलाम'{1962}जैसी कई बड़ी यादगार फिल्मों का निर्माण किया.फिल्म 'प्यासा'के बाद वहीदा रहमान और गुरुदत्त की जोड़ी फ़िल्मी परदे के साथ-साथ परदे के पीछे काफी चर्चित हो गयी.बॉलीवुड में इनके रूमानी रिश्ते काफी चर्चा होने लगी थी.गुरुदत्त जी ने करीब 20 फिल्मो का निर्माण किया,जिसमे'बाजी'{1951},'जाल'{1952},'सी.आई.डी.'{1956},'प्यासा'{1957},
'सैलाब'{1956},'बहारे फिर भी आएगी'{1966},'साँझ और सवेरा'{1964}, 'बहुरानी'{1963},'12o'क्लाक'{1958},'हम एक है'{1946},'लाखारानी' {1945},'चाँद'{1944}आदि प्रमुख है.
गुरुदत्त  साहब जब अपने कैरियर के उफान पर थे तब उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया.10 अक्टूबर 1964 को उनका निधन हो गया,लेकिन आज भी उनकी मौत का रहस्य बरकार है.क्योकि कुछ लोग कहते है कि उन्होंने खुदखुशी की थी.'साँझ और सवेरा'उनकी आखिरी फिल्म थी.'कागज के फूल'और'प्यासा'को टाइम पत्रिका ने 100 सर्व कालीन फिल्मों में शुमार किया है.और वह एशिया के 25 सर्वश्रेष्ठ अभिनेताओं में भी शामिल किया है.
गुरदत्त साहब अपने फिल्मांकन चहरे को नजदीक से दिखाने,रोशनी और साये का तालमेल,नाटकीयता की समझ और संगीत के इस्तेमाल के लिए हमेशा याद क्या जायेगा और हाँ साथ ही याद किये जायेगें कि उन्होंने अपनी पसंदीदा हिरोइन वहीदा रहमान के अनिंद्य सौंदर्य को किस तरह परदे पर दिखाया.....................वक्त ने उन्हें वक्त से पहले ही इस दुनियां से दूर कर दिया.उन्होंने सही कहा है...वक्त ने किया क्या हसी सितम .......................................                                                           
                                    

Tuesday, 3 May 2011

वहीदा रहमान :चौदहवीं का चाँद

       वह  अपनी हर फिल्म में नये ढंग से तराशा हुआ नया अंदाज लेकर आई.न मांसल सौंदर्य,न अंग प्रदर्शन,न कोई सेक्स अपील और न ही कोई बाजारू हरकते.लेकिन हर बार फ़िल्मी दर्शको को लगा कि यह लड़की जानी-पहचानी सी है.साथ ही वह भावुकता और व्यवहारिता का अदभुत सौंदर्य समन्वय है.उनकी आवाज में कशिश थी.उनकें नृत्य के दर्शक दीवाने थे.मै आज जिस सिने तारिका की बात कर रहा हूँ उनका नाम है-वहीदा रहमान जी.फिल्मों में चाहे उनका अल्हड़ लड़की का रोल{फिल्म बीस साल बाद १९६२} हो या फिर गम्भीर नर्स का{फिल्म ख़ामोशी १९६९}.सभी रोल को उत्तमता से निभा लेने की उनमे अच्छी योग्यता थी.उन्होंने १९५७ में सोने के दिल वाली तवायफ गुलाबो की भूमिका निभाई थी,जो जद्दोजहद कर रहे शायर को शुकून पहुचती है.१९६५{गाइड}में उन्होंने रोजी की भूमिका निभाई,जो अपने नपुंसक पति से दामन छुडाकर अपने प्रेमी के साथ रहने लगती है.इस दौरान उन्होंने अनगिनत फिल्मों में साबित कर दिया कि उनकी अलौकिक सुंदरता पुरुषों को पागल कर सकती है.उनका ओज बनावटी नहीं था.इसी वजह से आज भी लगता है कि चौदहवीं का चाँद गाना उन्ही के लिखा था.
वहीदा रहमान का जन्म १४ मई सन् १९३६ में तमिलनाडु के चेंगाल्पट्टू के एक परम्परागत मुस्लिम परिवार में हुआ था.चार बहनों में वहीदा सबसे छोटी थी.उनके पिता म्युनिस्पिल कमिश्नर थे.इस वजह से बचपन से ही ट्रेविलिंग बहुत होती थी.यानि हर तीन या चार साल बाद उनके पिता का तबादला हो जाता था.मतलब एकदम खानाबदोश जिंदगी.इन तबादलो की वजह से वह यथोचित शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकी.और साथ ही वह बचपन में बीमार भी रहती थी.इसका असर उनकी कक्षा की हाजिरी पर भी पड़ता था.और कक्षा में उनकी हाजिरी कम ही हो सकी.लेकिन वहीदा जी को बचपन से ही नृत्य और अभिनय से बहुत ही लगाव था.नौ-दस साल की उम्र में ही वहीदा जी ने भारतनाट्यम सिखाना शुरू कर दिया था.
समय धीरे-धीरे गुजरता गया.एक-एक करके तीनों बड़ी बहनों की शादी हो गयी.और वहीदा जी घर में अकेली रह गयी.तो उन्होंने सोचा क्यों न कुछ  काम किया जाय.सन् १९६५ में उन्हें एक के बाद एक दो तेलगू फिल्म में काम करने का अवसर मिला,तमिल फिल्म 'रेजरुमलाई'यानि परिवर्तन के दिन को बहुत बड़ी सफलता मिली.वहीदा जी का नृत्य दर्शकों को इतना पसंद आया कि सिनेमा वाले दर्शको को खुश करने के लिए मध्यांतर के पहले आने वाला उनका नृत्य का हिस्सा फिल्म के अंत में दुबारा चलते थे.फिल्म पूरे सौ दिन तक चली.इसके बाद वहीदा जी का रुख हिंदी फिल्मों कि तरफ हुआ,सबसे पहले अवसर उन्हें गुरुदत्त जी ने अपनी फिल्म 'सी.आई.डी.'{१९५६}में खलनायिका का रोल दिया.'सी.आई.डी.'प्रदर्शित हुई तो तहलका मच गया.बनाया गया था,अपराध चित्र,हत्या का नाटक और उभर कर आया संगीत का जादू.इसके बाद वहीदा जी मुंबई की होकर रह गयी.
सी.आई.डी.की सफलता के बाद फिल्म प्यासा{१९५७}में वहीदा जी को हिरोइन का रोल मिला और इस फिल्म के बाद वहीदा जी और गुरुदत्त साहब का विफल प्रेम प्रसंग का आरम्भ हुआ.गुरुदत्त जी और वहीदा जी अभिनीत फिल्म 'कागज के फूल'{१९५९}की असफल प्रेम कथा उन दोनों के स्वयं के जीवन पर आधारित थी.दोनों कलाकारों ने फिल्म 'चौदहवीं का चाँद'{१९६०}और 'साहिब बीबी और गुलाम'{१९६२}में साथ-साथ काम किया,जो बहुत ही सफल हुई.
सन् १९६३ में वहीदा जी और गुरुदत्त साहब के बीच मनमुटाव हो गया और दोनों अलग हो गए.इसके बाद सन १९६४ में गुरुदत्त जी ने आत्महत्या कर ली.वही वहीदा रहमान ने २७ अप्रैल १९७४ को कमलजीत सिंह,जो कि फिल्म 'शगुन'{१९६४}में उनके साथ हीरो थे,से विवाह कर लिया. 
वहीदा रहमान जी ने लगभग ७५ से अधिक फिल्मो में शानदार अभिनय से लोगो का मनोरंजन किया है.जिसमें से 'गाइड'{१९६५},'नीलकमल'{१९६८},'ख़ामोशी'{१९६९},'राखी'{१९६२},'दिल दिया दर्द  लिया'{१९६६},'तीसरी कसम'{१९६६},'राम औरश्याम'{१९६७},'प्रेमपुजारी'{१९७०},'मनमंदिर'{१९७१},'कभीकभी'{१९७६},'कुली'{१९८३},'लम्हे'{१९९१},'ओम जय जगदीश'{२००२}, 'दिल्ली-६'{२००९}उनकी उल्लेखनीय फ़िल्में है.
वहीदा पहली लड़की थी जिसने हिन्दुस्तानी सिनेमा की इस धारणा को  तोड़ा कि दक्षिण से आने वाली अभिनेत्री को सिवाय नाचने और कुछ नहीं आता.उनके भावभीने और मार्मिक अभिनय का जादू निर्माता-निर्देशकों के सिर पर इस कदर हावी रहा कि वे इस लाजवाब नृत्यांगना का ढंग से इस्तेमाल कारन ही भूल गए थे.सन् १९६६ में फिल्म गाइड के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का फिल्म फेयर अवार्ड दिया गया.सन् १९९४ में  फिल्म सिनेमा में उनके योगदान के लिए उन्हें फिल्म फेयर लाइफ टाइम अचीव मेंट से सम्मानित किया गया.भारत सरकार द्वारा सन् १९७२ में पदम श्री और २०११ में उन्हें पदम भूषन से सम्मानित किया गया.  
'वक्त ने किया क्या हसी सितम'-वहीदा जी ने चोटी की नायिकाओ के  क़तार में दो दशक शान और सम्मान के साथ गुजरे थे.वे दिन,वे लोग अब यांदों में सिमट गए.लेकिन यह नायिका अभी भी  रुपहले परदे पर कभी-कभी नजर आ जाती है.और शायद यही कहती है......तोड़ के बंधन बाँधी पायल.        

Saturday, 16 April 2011

बॉब क्रिस्टो: सॉरी बजरंग बाली

    र से गंजे,हाथ में वाइन का ग्लास और स्टाइलिस्ट विदेशी लिबाज में वह फ़िल्मी परदे पर नजर आते थे.उनके हिंदी संवाद को विदेशी लहजे में बोलने का अंदाज लोगो को खूब भाता था.हाँ मै आज बात कर रहा हूँ फिल्म अभिनेता बॉब क्रिस्टो की.बॉब हिंदी फिल्मो में खलनायक या ब्रिटिश अपसर की भूमिका में नजर आते थे.
आस्ट्रेलियाई  मूल बॉब का जन्म सिरका में १९३८ में हुआ था.इनका असली नाम रॉबर्ट जॉन क्रिस्टो था.लेकिन वह हिंदी सिनेमा में बॉब क्रिस्टो के नाम से मशहूर थे.बॉब मूल रूप से इंजीनियर थे,लेकिन अच्छी कदकाठी के बदौलत उन्हें माडलिंग के कई ऑफर मिल चुके थे.आस्ट्रेलियाइ मूल के बॉब भारत में जानी-मानी अभिनेत्री परवीन बॉबी से मिलने आये थे.और वह यही के होकर रह गए.बॉब को पहला ब्रेक संजय खान द्वारा निर्मित फिल्म 'अब्दुल्ला'{१९८०} में बतौर खलनायक मिला.जिसमें उनके अभिनय की खूब तारीफ की गयी.इसके बाद बॉब ने भारत में ही रुकने का निर्यण किया.और दो दशको तक करीब २०० हिंदी फिल्मों में मुख्य खलनायक या उसके सहायक के किरदार में अभिनय करते नजर आये.बॉब ने हिंदी फिल्मों के अलावा तमिल,तेलगु और कन्नड़ फिल्मों में भी काम किया.बॉब को ज्यादा बड़े रोल नहीं मिले लेकिन फिर भी वह अपनी पहचान गढने में कामयाब रहे.उन्होंने उस दौर में सुपर स्टार अमिताभ बच्चन से लेकर तमिल स्टार रजनीकांत के साथ काम किया.फिल्म 'मिस्टर इंडिया'{१९८७}का मिस्टर वोल्कोट वाला किरदार आज भी लोगो की जेहन में है,जिसमें उनके द्वारा बोला गया डॉयलाग 'जय बजरंग बली' व 'सॉरी बजरंग बली' पर उन्होंने खूब वाहवाही बटोरी.
कुर्बानी'{१९८०}'कालिया'{१९८१}, 'नास्तिक'{१९८३}, 'मर्द' {१९८५}, 'गिरिफ्तार' {१९८५}, 'मिस्टर इंडिया'{१९९३}, 'गुमराह'{१९९३} और 'प्रेम'{१९९५}आदि फिल्मों में उनकी भूमिका को काफी सराहा गया.इस नयी सदी में उन्होंने कुछ गिनी चुनी फ़िल्में 'वीर सावरकर'{२००१},'कसम'{२००१},'अमन के फ़रिश्ते'{२००३}की.और फिल्मों से दूर हो गए तथा बेंगलूर में वह योगा इंस्ट्रक्टर के रूप में जीवन यापन करने लगे.लेकिन अभिनय के शौकीन यह सितारा अक्षय कुमार की फिल्म से हिंदी फिल्मों में वापसी करना चाहता था.लेकिन यह हो न पाया,क्योकि यह फ़िल्मी सितारा इस दुनिया से २० मार्च २०११ को सदा के लिए अस्त हो गया.७२ वर्ष के बॉब को दिल का दौरा पड़ा और बेंगलूर में ही उनका निधन हो गया.अब उनके परिवार में उनकी पत्नी नरगिस तथा दो पुत्र सुनील व दोरियस है.हाल ही में उनके जीवन पर आधारित किताब 'फ्लैश बैक माइ टाइम्स इन बॉलीवुड एण्ड वियांडको'अभिनेता अक्षय कुमार लांच करने वाले थे.जो अब जून में लंच होगी.
बॉब ३६ वर्ष तक भारत में रहे,जर्मन और आस्ट्रेलियन भाषा बोलने वाले बॉब ने हिंदी फिल्मों में अभिनय के लिए ही हिंदी और उर्दू भाषा  भी सीखी थी.हिंदी फिल्मों का यह अभिनेता भले ही आज इस दुनियां न हो,लेकिन वह हम सब के दिलो व फ़िल्मी परदे पर हमेशा जिन्दा रहेगा और यही कहते दिखेगा...............सॉरी बाजरंग बली.
 
 

Friday, 15 April 2011

प्राण :हरफनमौला

 
   तलवार  जैसी मूंछे,उन पर फबने वाले हैटऔर परदे पर जोर दार उपस्थिति,वे बहुत ही स्टाइलिस्ट शख्स थे,हाँ मै बात कर रहा हूँ,हिंदी के जाने-माने नायक,खलनायक और चारित्रिक अभिनेता प्राण साहब की. प्राण का जिक्र आते ही आँखों के सामने एक ऐसा भावप्रवण चेहरा आ जाता है,जो अपने हर किरदार में जान डालते हुए यह अहसास करा जाता है,कि उसके बिना यह किरदार अर्थहीन है.उनकी संवाद अदायगी की  शैली को लोग आज भी नहीं भूले है.
इस हरफनमौला अभिनेता को दशको  तक बुरे आदमी {खलनायक}के तौर पर जाना जाता रहा और ऐसा हो भी क्यों ना,परदे पर उनकी विकरालता इतनी जीवंत थी,कि लोग उसे ही उनकी वास्तविक छवि मान बैठे.लेकिन फ़िल्मी परदे से इतर प्राण असल जिंदगी में वे बेहद सरल,ईमानदार,और दयालु व्यक्ति थे.समाज सेवा और सबसे  अच्छा व्यवहार करना उनका गुण था.
१२ फरवरी १९२० को प्राण का जन्म पुरानी दिल्ली को वल्लीमारन इलाके में बसे एक रईस परिवार में हुआ.प्राण का असली नाम 'प्राण कृष्ण सिकन्द'था.लेकिन फ़िल्मी दुनियां में वे प्राण नाम से प्रसिद्ध थे.इनकी पत्नी  का नाम 'शुक्ला सिकन्द'था.प्राण के दो पुत्र 'अरविन्द' और 'सुनील' तथा एक पुत्री पिंकी है.बचपन से पढाई में होशियार प्राण एक स्टिल फोटोग्राफर बनाना चाहते थे.लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था.बात वर्ष १९४० की है,एक दिन प्राण साहब पान की दुकान पर खड़े थे,तभी  पंजाबी फिल्मों के डाएरेक्टर मोहम्द वली की नजर उन पर पड़ी,तो उन्हें अपनी पंजाबी फिल्म 'यमला जट' में ले लिया.और फिल्म काफी हिट हो गयी.और यही से उदय हुआ बॉलीवुड के एक नायब सितारे का.इसके बाद प्राण ने 'चौधरी'और फिर 'खजांची'फिल्म में काम किया.फिर क्या था प्राण ने कभी दोबारा पीछे मुड़कर देखा ही नहीं और वर्ष १९४७ तक वह २० से ज्यादा फिल्मो में काम कर चुके थे.और एक हीरो वाली इमेज के साथ इंड्रस्ट्री में काम कर रहे थे.हाँलाकि लोग उन्हें विलेन के रूप में देखना ज्यादा पसंद करते थे. 
प्राण की शुरुवाती फिल्मे हो या बाद की कभी भी उन्होंने अपने आप को दोहराया नहीं,उन्होंने अपने हर किरदार को बड़े जीवंत ढंग से जिया,फिर चाहे वह भूमिका छोटी हो या बड़ी.वर्ष १९५६ आई फिल्म 'हलाकू' से उन्हें बड़ी सफलता मिली.जिसमें उन्होंने डकैत हलाकू का सशक्त किरदार निभाया था.तदुपरांत राजकपूर निर्मित 'जिस देश में गंगा बहती है'में दोबारा फिर से प्राण डाकू राका की भूमिका निभाई,जिसमें उन्होंने केवल अपनी आँखों से क्रूरता जाहिर कर दी,लेकिन वर्ष १९७३ में फिल्म 'जंजीर'में अमिताभ बच्चन के मित्र शेरखान के रूप में उन्होंने अपनी आखों से ही दोस्ती का भरपूर सन्देश दे दिया.इस फिल्म का गीत 'यारी है इमान मेरा  यार मेरी जिंदगी'सिर्फ और सिर्फ उनके नृत्य की वजह से याद किया जाता है.वर्ष १९७४ फिल्म 'मजबूर' का गीत 'फिर ये मत कहना माइकल दारू पी  के दंगा'आज भी युवाओ को नहीं भुला. वर्ष १९६७ में भारत कुमार यानि मनोज कुमार  द्वारा निर्मित  फिल्म 'उपकार'में वह एक अलग रूप मंगल  बाबा का रोल किया.जिसमें वह एक अपाहिज के रूप में नजर आये.भूमिका छोटी जरूर थी लेकिन उनको दमदार अभिनय के लिए उन्हें पुरुस्कृत भी किया गया.उन पर फिल्माया गया गीत 'कसमे वादे प्यार वफ़ा सब' आज भी लोगो के जेहन में बसा हुआ है.वर्ष १९७२ फिल्म 'विक्टोरिया नंबर २०३ ' में प्राण साहब अशोक कुमार के साथ कॉमेडी करते नजर आये.इस नयी भूमिका के लिए लोगो ने उन्हें खूब सराहा गया.
प्राण ने करीब ३५० फिल्मो में अलग-अलग अभिनय के रंग बिखेरे,जिसमे 'पत्थर के सनम','तुमसा नहीं देखा','बड़ी बहन','मुनीम जी','गंवार','गोपी','हमजोली',दस नम्बरी','अमर अकबर अन्थोनी','दोस्ताना' 'कर्ज','अंधा कानून','पाप की दुनियां','मृत्युदाता' आदि प्रमुख फिल्मे थी. अभिनय में रंग बिखेरने के अतरिक्त प्राण कई सामाजिक संगठनो से भी जुड़े है.और उनकी अपनी एक फ़ुटबाल टीम बॉम्बे डायनेमस  फ़ुटबाल क्लब भी है.
प्राण को अपने फ़िल्मी जीवन में तीन बार सर्वश्रेष्ट सहायक अभिनेता का फिल्म फेयर अवार्ड दिया गया.वर्ष १९९७ में उन्हें फिल्म फेयर लाइफ टाइम अचीवमेंट ख़िताब से नवाजा गया.हिंदी सिनेमा को योगदान के लिए २००१ में भारत सरकार के पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था.
प्रेमी,बदमाश,कामेडियन और इन सबके भीतर और परे सब कुछ प्राण हर किरदार में जान डाल देते थे,उसमें ढल जाते थे.उन्होंने कभी भी अभिनय का प्रशिक्षण नहीं लिया था,वह उस दौर के कलाकार है,जब अभिनय प्रशिक्षण केन्द्रों का देश में नामोनिशान नहीं था.लेकिन उन्हें अभिनय की चलती फिरती पाठशाला कहा जा सकता है.ये स्टाइलिस्ट शख्स हर भूमिका को अलग-अलग स्टाइल से अदा करने के लिए हमेशा याद किया  जायेगा.......

Thursday, 14 April 2011

राजेश खन्ना :सिर चढ़कर बोला जादू

 
    स्टाइल  के लिहाज से उनका जादू चलता है.वे आँख मारकर ही महिलाओं को बेहोश कर कर सकते थे.उस समय लड़कियां उन्हें अपने खून से खत भेजने लगी थी.जब भी उनकी कार निकलती,तो लड़कियां उनकी कार को किस कराती थी.युवा वर्ग तो उनका दीवाना था.उस दौर में वह हर हिरोइन के अकेले सुपरस्टार हीरो हुआ करते थे.उनके बोलने का अपना ही दिलकश अंदाज था.अपने रूमानी अंदाज,स्वाभाविक अभिनय और कामयाब फिल्मो के लंबे सिलसिले के बल पर उन्होंने करीब डेढ़ दशक तक हिंदी सिनेमा के रूपहले परदे पर राज किया.ये कोई और नही अपने काका थे यानि राजेश खन्ना.हिंदी सिने प्रेमियों को राजेश खन्ना के रूप में हिंदी सिनेमा का पहला सुपर स्टार मिला,जिनका जादू लोगो के सिर चढ़कर बोला.
राजेश खन्ना का जन्म २९ दिसम्बर सन् १९४२को पंजाब के अमृतसर शहर में हुआ था.राजेश खन्ना का असली नाम जतिन खन्ना है.वह उन कुछ चुनिन्दा सितारों में से है जिन्होंने  बॉलीवुड में पदार्पण किसी गाडफादर के जरिये नहीं किया बल्कि राष्ट्रीय स्टार पर आयोजित प्रतियोतिता जीतकर किया.परिवार की मर्जी के खिलाफ अभिनय को बतौर कैरियर को चुनने वाले राजेश खन्ना ने  वर्ष  १९६६ में अपने अभिनय की शुरुवात फिल्म 'आखिरी खत'से किया.उनको पहली सफलता तब मिली जब फिल्म 'बहारों के सपने'ने बॉक्स ऑफिस पर सफलता अर्जित की लेकिन अब भी वह फ़िल्मी जगत में संघर्ष कर रहे थे क्योकि बाद में उनकी कई फिल्मे बॉक्स ऑफिस पर असफल हो गयी.
वर्ष  १९६९ में आई फिल्म 'अराधना'ने राजेश खन्ना के कैरियर को नयी दिशा दी.फिल्म को अपार सफलता मिली.फिल्म में शर्मीला के साथ उनकी जोड़ी बहुत पसंद की गयी.बाद में उन्होंने शर्मीला के साथ 'सफर','बदनाम','फ़रिश्ते','छोटी बहू','अमर प्रेम','राजा रानी'और 'आविष्कार' की.ये फिल्मे भी बहुत कामयाब रही थी.जबकि 'दो रास्ते','बंधन','सच्चा झूठा',दुश्मन','अपना देश','आप की कसम','रोटी' और 'प्रेमकहानी'में मुमताज के साथ उनकी जोड़ी पसंद की गयी.उन्होंने जिन प्रमुख हेरोइन के साथ ज्यादा काम किया उनमें शर्मीला,मुमताज,हेमामालिनी,और आशा पारेख थी.फिल्म आराधना के बाद उन्होंने ४ साल लगातार 'दो रास्ते','ख़ामोशी','सच्चा झूठा'जैसी करीब १५ हिट फिल्मे देकर समकालीन तथा अगली पीढ़ी के अभिनेताओ के लिए मील का पत्थर कायम किया.वर्ष १९७१ में 'कटी पतंग','आन्नद','आन मिलो सजना','महबूब की मेहदीं','हाथी मेरे साथी'और 'अंदाज'जैसी सुपर हिट फिल्मे दी ,यह साल उनके कैरियर का सबसे यादगार साल रहा.जिससे वह हिंदी सिनेमा के पहले सुपर स्टार बनकर प्रशंसको के दिल पर छा गए.
वर्ष १९७० में फिल्म 'सच्चा झूठा' के लिए उन्हें पहली बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्म फेयर अवार्ड दिया गया.भाव पूर्ण दृश्यों में राजेश खन्ना के सटीक अभिनय को आज भी याद किया जाता है.वर्ष १९७१में 'आनंद' के लिए उन्हें दूसरी बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्म फेयर अवार्ड दिया गया.इस फिल्म में एक लाइलाज बीमारी से पीड़ित व्यक्ति के किरदार को उन्होंने एक जिंदादिल इंसान के रूप में जीकर कालजयी बना दिया.यह उनके अभिनय का शसक्त उदहारण है.साल २००५ में उन्हें फिल्म फेयर लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड दिया गया.
फ़िल्मी दुनियां के इस चमत्कारी नायक के स्टाइल के लिहाज से जादू चलता था.पहनावे के हिसाब से वे अपने ज़माने के प्रतीक  थे.उनके छोटे कुर्ते,चाइनीज कॉलर,दोहरी सिलाई वाली जैकेट,कमीज के साथ सपाट ट्राउजर और बेल्ट के असंख्य युवा दीवाने थे.
वर्ष १९७६ के बाद का समय राजेश खन्ना के लिए कुछ अच्छा नहीं रहा.उनकी ज्यादातर फिल्मे असफल होने लगी.इसके बाद वह बॉलीवुड में नजरअंदाज किये जाने लगे,क्योकि वह अकसर सूटिंग पर लेट पहुँचते थे और उनका रवैया बदल गया.कुछ समय बाद उनमें बदलाव आया और उन्होंने कुछ सामाजिक फिल्मे की.
राजेश खन्ना,आर.डी.बर्मन और किशोर कुमार तीनों ने मिलकर काफी सफल फिल्मे दी.इन तीनों गहरे दोस्तों ने करीब ३० फिल्मो में साथ-साथ काम किया.उस समय किशोर के स्वर से राजेश खन्ना पहचाने जाने लगे थे.कुछ और कलाकार जिन्होंने राजेश खन्ना के साथ एक टीम के रूप में कई फिल्मो में काम किया,उसमें प्रमुख सुजीत कुमार,प्रेम चोपड़ा,मदन पुरी,असरानी,बिंदु,विजय अरोड़ा और ए.के.हंगल आदि प्रमुख थे.
६०  के दशक में अंजू महेंदू के साथ उनके रोमांस के खूब चर्चे हुए.लेकिन ७० का दशक आते-आते दोनों में अलगाव हो गया और वर्ष १९७३ में राजेश खन्ना ने खुद से उम्र में काफी छोटी नवोदित अभिनेत्री डिम्पल कपाडिया से शादी कर ली.डिम्पल से उनको दो बेटियां ट्विंकल खन्ना और रिंकी खन्ना हुई.लेकिन १९८४ में दोनों अलग हो गए.और वह कुछ समय के लिए टीना मुनीम के भी प्यार में रहे.लेकिन बाद में फिर उनके और डिम्पल के बीच प्यार जागा और दोनों साथ रहने लगे.
८० के दशक के बाद फिल्मो से ब्रेक लेकर उन्होंने राजनीति की ओर कदम रखा और १९९१ से १९९६ के बीच नई दिल्ली से कॉग्रेस के लोक सभा सांसद भी रहे.लेकिन अभिनय और राजनीति में अपना भाग्य अजमा चुके राजेश खन्ना का ज्यादा मन अभिनय में ही लगा और वह फिर से फिल्मो और टी.वी.पर लौट आये तथा टी.वी. के कई सीरियल में भी दिखाई पड़े.
वर्ष १९९४ में उन्होंने फिल्म 'खुदाई'से अभिनय की दूसरी पारी की शुरुवात की.उसके बाद उन्होंने 'आ अब लौट चले','क्या दिल ने कहा','वफा','जाना','काश मेरे होते','दो दिलो के खेल में'आदि फिल्मो में काम किया.लेकिन उन्हें वह सफलता दोबारा  नहीं मिल पाई.फिर भी आज उनका फ़िल्मी सफर जारी है.आज भी उनकी खास अदाएं बॉलीवुड के इतिहास का ऐसा अध्याय है,जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती....

 

Wednesday, 13 April 2011

ऋषिकपूर:असली वैलेंटाइन

   साल १९७० फिल्म मेरा नाम जोकर हिंदी सिनेमा के रुपहले परदे पर एक कच्चा,गोल-मटोल लड़का दिखाई पड़ा.यही से हिंदी सिनेमा में एक नये सितारे का उदय हुआ.यह सितारा था चिंटू यानि ऋषिकपूर. ऋषिकपूर का जन्म सन १९५२ में जाने-माने अभिनेता और निर्माता-निर्देशक राजकपूर के दूसरे बेटे के रूप में हुआ.उनके घर-परिवार वाले उन्हें प्यार से चिंटू कहते थे. घर में फिल्मो का माहौल होने के कारण ऋषिकपूर का रुझान फिल्मो की तरफ हो गया.पहले पहल पिता राजकपूर ने अपनी सबसे महत्त्वाकांक्षी फिल्म 'मेरा नाम जोकर' में उन्हें पेश किया.इस फिल्म में उन्होंने १४ वर्ष के लड़के की भूमिका निभाई,जो अपनी शिक्षिका से ही प्रेम करने लगता है.इस छोटे लड़के ने अपने अभिनय से लोगो के दिल में जगह बना ली.अपसोस,यह फिल्म बाक्स ऑफिस पर पिट गयी.लेकिन ऋषिकपूर को अपने दमदार अभिनय के लिए उन्हें उस साल का सर्वश्रेष्ठ बाल कलाकार का राष्ट्रीय पुरूस्कार मिला.
साल १९७३ एक दुबला-पतला,चुस्त-दुरुस्त हीरो राजकपूर निर्मित फिल्म 'बाँबी' में दिखाई पड़ा.लोग हैरान रह गए क्योकि यह कोई और नहीं यह ऋषिकपूर थे.फिल्म की नायिका डिम्पल कपाडिया थी.फिल्म टीन एजर्स को घ्यान में रखकर बनायीं गयी थी.इस फिल्म ने सफलता के नये रिकार्ड बनाये और साल की जबरदस्त हिट फिल्म थी.साथ ही ऋषिकपूर अपने चाकलेटी चेहरे और बाँबी वाले रोमांटिक रोल की बदौलत उन्होंने प्रसंशको का एक वर्ग खड़ा कर लिया.   
साल १९७५ बाँबी के बाद फिल्म खेल खेल में ऋषिकपूर के खाते में एक और बड़ी सफलता दर्ज करा दी.फिल्म खेल खेल में उनकी नायिका नीतू सिंह थी.जो बाद में उनके रियल लाइफ की भी नायिका बनी.नीतू सिंह के साथ उनकी जोड़ी हिट 
हुई,उन्होंने रफूचक्कर,जहरीला इंसान,जिंदादिल,कभी-कभी,अमर अकबर एंथोनी,अनजाने,दुनिया मेरी जेब में,झूठा कही का,धनदौलत,दूसरा आदमी,साथ-साथ की.
 वास्तव में ऋषिकपूर उस दौर में अकेले चाकलेटी और रोमांटिक हीरो थे.जहाँ तक उनके अभिनय की बात की जाय,तो ऋषिकपूर अपने भाइयों पर ही नहीं अपने पिता और चाचाओ पर भी भरी पड़ते थे.उस दौर में जब अमिताभ बच्चन,संजीव कुमार,और विनोद खन्ना जैसे मंझे कलाकारों की मौजूदगी में भी ऋषिकपूर ने दमदार अभिनय से दर्शको को दीवाना बना लिया और अपने दम पर लगातार हिट फिल्मे दी.
८० के दशक में 'सरगम' और 'कर्ज' जैसी हिट फिल्में देने के बाद एक बार फिर अपने पिता के निर्देशन में फिल्म 'प्रेमरोग' में नजर आये.नायिका प्रधान फिल्म होने के बावजूद ऋषिकपूर सब पर छाये रहे.इसके बाद ऋषिकपूर ने 'नगीना','चांदनी','हिना','बोल राधा बोल','दामिनी',आदि से होते हुए ९० के दशक तक हीरो की पारी खेलते रहे.फिल्म 'बाँबी' से शुरू हुआ एक रंगीला सफर शोख टी-शर्ट,चुस्त कमीज,एक रंग सूट,गोल टोपी और बड़ा चश्मा जो बाद के दिनों में बहुरंगी पुलओवर और सफ़ेद पैंटो के बिना अधूरा माना जाता है.
आज नयी सदी के दशक में ऋषिकपूर पिता तथा चारित्रिक भूमिकाओ में नजर आ रहे है.'हम-तुम','फना','नमस्ते-लन्दन','लक बाय चांस','लव आज कल',आदि फिल्मो में भी उनका अभिनय दमदार था. ऋषि अपने चार दशक लंबे फ़िल्मी कैरियर में लगभग १२५ फिल्मो में काम किया.हाल ही में आई फिल्म 'पटियाला हॉउस' में ऋषिकपूर अक्षय के पापा की भूमिका में नजर आये.कभी रोमांटिक और चाकलेटी हीरो कहे जाने वाले आज बुजुर्ग और चारित्रिक भूमिकाओ में भी अपनी शसक्त उपस्थिति दर्ज करा रहे है.इसलिए सही कहा जाता है-ओल्ड इज गोल्ड.......



Tuesday, 12 April 2011

विनोद खन्ना:मर्दानगी की मिसाल

चौड़ी कद-काठी वाले विनोद खन्ना की अदाकारी तो दर्शकों को आज तक याद है.उस दौर में जब सुपर स्टार अमिताभ बच्चन का क्रेज और जीतेन्द्र का जलवा लोगो के सिर चढ़कर बोल रहा था,तब विनोद खन्ना ही एक ऐसे कलाकर थे,जो उनके सबसे निकटतम प्रतिद्वंव्दी थे.उन्होंने अपना फ़िल्मी सफर सुनील दत्त द्वारा 1968 में निर्मित फिल्म 'मन का मीत'से शुरू किया.उसमें उन्होंने विलेन का रोल किया था लेकिन यही विलेन आगे चलकर बड़े-बड़े हीरो पर भारी पड़ने लगा.
फिल्म 'अमर अकबर एंथोनी'का दृश्य आज भी लोगो के जेहन में है,जिसमे वह अमिताभ बच्चन को उन्ही के इलाके में जाकर लड़ाई के लिए ललकारते है.धर्मेन्द्र के बाद अगर किसी हीरो ने लड़कियों पर अपनी मैचो मैन की छवि बनायीं,तो वे थे विनोद खन्ना.फिल्म कुर्बान{1986}में उन्होंने टी शर्ट और चुस्त जींस पहनी.नीचे फैली हुई पैंट,सीना दिखने वाली कमीज ने उन्हें पुरुषत्व का प्रतीक बना दिया,जिससे लोग उनके दीवाने हो गए.
अमिताभ बच्चन के साथ उन्होंने 'परवरिश','हेरा-फेरी',और 'अमर अकबर एंथोनी'जैसी फिल्में की लेकिन अभिनय से लेकर पर्सनालिटी तक कहीं भी वह अमिताभ से उन्नीस साबित नहीं हुए.विनोद खन्ना जब अपने फ़िल्मी कैरियर के चरम पर थे,तब उन्होंने फ़िल्मी दुनियां से विदाई ले ली और ओशो की शरण में चले गए.आठ वर्ष के बाद वह एक बार फिर फ़िल्मी दुनिया में लौटे तथा फिर से खुद को साबित किया.खलनायक और फिर अभिनेता से लेकर राजनेता तक,रील लाइफ से लेकर रियल लाइफ में विनोद खन्ना ने हर तरह के किरदार का स्वाद चखा.
शुरुवात  में उन्होंने बतौर खलनायक कई फिल्में साइन की,जिसमें 'मेरा गाँव मेरा देश','पत्थर और पायल','आन मिलो सजना' तथा 'अनोखी अदा' आदि प्रमुख थी.सर्वप्रथम गुलजार ने उन्हें अपनी फिल्म 'मेरे अपने'में बतौर हीरो लिया.उसमें उनकी हिरोइन मीना कुमारी थी.इस फिल्म के बाद विनोद खन्ना ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और उनके फ़िल्मी कैरियर को नयी दिशा मिली.विनोद खन्ना इससे पहले 'रेशमा शेरा','पूरब और पश्चिम',  'सच्चा-झूठा' में छिटपुट रोल कर चुके थे.विनोद खन्ना ने अपने अभिनय  से युवा दिलों पर खूब राज किया और उनके अभिनय की उड़ान आज भी जारी है.फिल्म 'दबंग' में वह सलमान के पापा की भूमिका में नजर आये.विनोद खन्ना हिंदी फिल्मों के लीजेंड में से एक है...

Monday, 11 April 2011

दो शब्द

इस नये ब्लॉग में आप सभी सुधी पाठकों का स्वागत है.ये मेरा नया ब्लॉग  सिने जगत की कुछ  महान हस्तियों की भुली-बिसरी यांदों को आप सभी तक पहुचना है.अगर आप लोगो का साथ व आशीर्वाद  रहा,तो यह काम पूरी लगन व ईमानदरी से करता रहूगां.मै अपने सभी पाठकों से बेबाक टिप्पणी और मशविरा देने  का विनम्र आग्रह करता हूँ,ताकि विचारों की प्रवाहमान नदी के बहाव का सही अंदाजा लगाया जा सके.         
                                                                                            
                                                                                                      
                                                                                                                                        --पुष्कर सिंह